शारदीय नवरात्रि के अवसर पर मध्य प्रदेश के देवास स्थित प्रसिद्ध माता टेकरी पर श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ रहा है। 300 फीट ऊंची प्राकृतिक पहाड़ी पर विराजित मां तुलजा भवानी और मां चामुंडा देवी के दर्शन के लिए प्रतिदिन डेढ़ लाख से ज्यादा श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। पौराणिक परंपराओं में इन दोनों देवियों को बहनों के रूप में पूजा जाता है।
सती का रक्त गिरने से 'रक्तपीठ' के रूप में विख्यात
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस पावन पहाड़ी पर माता सती के शरीर का रक्त गिरा था, जिसके चलते इसका प्राकट्य रक्तपीठ के रूप में हुआ। टेकरी पर प्रमुख रूप से 9 देवियों—तुलजा भवानी, मां चामुंडा, पार्वती, विजयासन, कालिका, अष्टभुजा, अन्नपूर्णा, खो-खो माता और अम्बे माता के दिव्य स्वरूपों की पूजा की जाती है।
माता तुलजा भवानी दिन में देती हैं तीन स्वरूपों में दर्शन
मान्यता है कि बड़ी माता तुलजा भवानी के स्वरूप में दिनभर में तीन बार दिव्य बदलाव देखने को मिलता है। देवी सुबह बाल रूप में, दोपहर में युवा अवस्था में और रात्रि में वृद्ध स्वरूप में दर्शन देती हैं। यह टेकरी नाथ संप्रदाय के तपस्वियों की प्रमुख साधना स्थली भी रही है। इसके अलावा सम्राट विक्रमादित्य भी यहां उपासना करने आते थे। ऐसी भी मान्यता प्रचलित है कि उज्जैन की भर्तृहरि गुफा से टेकरी तक लगभग 45 किलोमीटर लंबी सुरंग हुआ करती थी।
पौराणिक कथा: जब हनुमान जी और भैरव जी ने रोका
प्राचीन आख्यानों के अनुसार, एक बार दोनों बहनों (बड़ी माता तुलजा भवानी और छोटी माता चामुंडा) के बीच किसी बात को लेकर मतभेद हो गया था। इस कारण दोनों अपने स्थान को छोड़कर जाने लगीं। छोटी माता चामुंडा पहाड़ी को फाड़कर दूसरी ओर जाने लगीं, जबकि बड़ी माता तुलजा भवानी पाताल में समाने लगीं। तभी संकटमोचक हनुमान जी और भैरव जी ने दोनों को शांत कर वहीं रुकने की प्रार्थना की। आज भी बड़ी माता का आधा स्वरूप और छोटी माता का स्वरूप उसी अवस्था में टेकरी पर विराजित है।
श्रद्धालुओं के लिए रोप-वे और 1 किमी लंबा परिक्रमा पथ
टेकरी पर आने वाले श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए कई रास्ते विकसित किए गए हैं। यहां एक किलोमीटर लंबा परिक्रमा पथ बना हुआ है। इसके अतिरिक्त सीढ़ी मार्ग, रपटा मार्ग और भोपाल चौराहे से आधुनिक रोप-वे की व्यवस्था है। संतान प्राप्ति की कामना करने वाले भक्त यहां माता के दरबार में पांच पान का बीड़ा अर्पित करने की परंपरा निभाते हैं।
