दशहरा यानी विजयादशमी का पर्व देशभर में अलग-अलग रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है। रीवा और सतना में भी इस त्योहार की अपनी खास पहचान है। रीवा में बघेल राजवंश से जुड़ी राजगद्दी पूजन की परंपरा और रामलीला का विशेष महत्व है, जबकि सतना जिले के कोठी कस्बे में रावण को जलाने के बजाय उसकी पूजा की जाती है।
विजयादशमी को सामान्य रूप से बुराई पर अच्छाई और अधर्म पर धर्म की जीत का प्रतीक माना जाता है। भगवान राम की रावण पर विजय और मां दुर्गा द्वारा महिषासुर के वध से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं इस पर्व के महत्व को बताती हैं। हालांकि, अलग-अलग क्षेत्रों में स्थानीय इतिहास और परंपराओं के कारण दशहरा मनाने का तरीका अलग हो सकता है।
रीवा में राजगद्दी पूजन से जुड़ी है राजवंश की विरासत
रीवा में दशहरा केवल रावण दहन तक सीमित नहीं है। यहां बघेल राजवंश की विरासत से जुड़ा राजगद्दी पूजन भी इस पर्व की एक महत्वपूर्ण परंपरा है। इसे राजपरिवार की ऐतिहासिक परंपराओं और धार्मिक आस्था से जोड़कर देखा जाता है।
स्थानीय परंपरा के अनुसार, विजयादशमी पर राजगद्दी पूजन के बाद रामलीला और अन्य धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। रीवा की रामलीला की शुरुआत वर्ष 1840 में होने की जानकारी दी जाती है। इस तरह यह आयोजन शहर की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बना हुआ है।
रीवा में सार्वजनिक दशहरा उत्सव के दौरान रावण दहन भी होता है। इस वर्ष नगर विजयादशमी उत्सव समिति की ओर से 20 अक्टूबर को एनसीसी ग्राउंड स्थित दशहरा मैदान में रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतलों के दहन का कार्यक्रम घोषित किया गया है।
सतना के कोठी में रावण को जलाने के बजाय होती है पूजा
सतना जिले के कोठी कस्बे में दशहरे की परंपरा बाकी जगहों से अलग है। यहां रावण का पुतला जलाने के बजाय उसकी पूजा की जाती है। स्थानीय मान्यता और परंपरा के अनुसार, इस आयोजन में दशानन को पूजने की रस्म निभाई जाती है।
यह परंपरा क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है। जहां अधिकांश स्थानों पर विजयादशमी के अवसर पर रावण दहन किया जाता है, वहीं कोठी में पूजा की परंपरा दशहरे के विविध रूपों को सामने लाती है। इस आयोजन के पीछे की स्थानीय मान्यताओं को समझने के लिए क्षेत्र के लोगों और परंपरा से जुड़े जानकारों की जानकारी महत्वपूर्ण है।
सतना शहर में रावण दहन और चल समारोह की तैयारी
सतना शहर में दशहरा चल समारोह और रावण दहन के कार्यक्रम को लेकर अलग व्यवस्था है। उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक, श्री बिहारी रामलीला समाज ने शहर में रावण दहन और दशहरा चल समारोह के लिए 21 अक्टूबर की तारीख तय की है। प्रशासन ने आयोजन स्थलों पर सुरक्षा और नागरिक सुविधाओं की तैयारियों का जायजा भी लिया है।
इसलिए सतना जिले के कोठी की दशानन पूजा और सतना शहर के रावण दहन को एक ही आयोजन नहीं समझना चाहिए। दोनों की स्थानीय परंपराएं और कार्यक्रम अलग हैं।
दशहरा क्यों मनाया जाता है?
धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान राम ने विजयादशमी के दिन रावण पर विजय प्राप्त की थी। इसी कारण कई स्थानों पर रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन किया जाता है। यह आयोजन अहंकार, अन्याय और बुराई के अंत का प्रतीक माना जाता है।
शक्ति उपासना की परंपरा में भी विजयादशमी का विशेष महत्व है। दुर्गा पूजा के बाद इस दिन को मां दुर्गा की महिषासुर पर विजय से जोड़कर देखा जाता है। देश के अलग-अलग हिस्सों में इन धार्मिक कथाओं और स्थानीय रीति-रिवाजों के आधार पर पर्व मनाया जाता है।
