नई दिल्ली। परिसीमन और महिला आरक्षण को लेकर केंद्र सरकार की पहल ने संसद से बाहर भी राजनीतिक चर्चा तेज कर दी है। सरकार की ओर से विपक्षी दलों से बातचीत किए जाने और कांग्रेस से सहयोग की अपील के बीच यह सवाल उठ रहा है कि क्या नए प्रस्ताव पर व्यापक सहमति बन पाएगी। कांग्रेस चाहती है कि किसी भी नए संवैधानिक बदलाव पर आगे बढ़ने से पहले सभी राजनीतिक दलों के साथ औपचारिक बैठक की जाए।
यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है, जब कांग्रेस और कई क्षेत्रीय दल मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर भी सरकार के खिलाफ सवाल उठा रहे हैं। हालांकि, परिसीमन पर अलग-अलग दलों का रुख क्या होगा, यह किसी साझा फैसले या मतदान के बिना तय नहीं माना जा सकता।
अप्रैल में लोकसभा में पारित नहीं हो सका था विधेयक
अप्रैल 2026 में केंद्र सरकार ने लोकसभा में परिसीमन और महिला आरक्षण से संबंधित संवैधानिक बदलावों के लिए विधेयक पेश किया था। प्रस्ताव में लोकसभा की सदस्य संख्या बढ़ाने, परिसीमन की प्रक्रिया आगे बढ़ाने और महिलाओं के लिए आरक्षण को नए परिसीमन से जोड़ने जैसे प्रावधान शामिल थे।
17 अप्रैल को संविधान संशोधन विधेयक पर मतदान हुआ, लेकिन उसे जरूरी दो-तिहाई बहुमत नहीं मिला। उपलब्ध संसदीय विवरण के अनुसार, विधेयक के पक्ष में 298 और विरोध में 230 वोट पड़े। उपस्थित और मतदान करने वाले 528 सदस्यों में से कम से कम 352 सदस्यों का समर्थन जरूरी था। इसके साथ ही इस संविधान संशोधन विधेयक के पारित होने पर निर्भर अन्य संबंधित विधेयक भी आगे नहीं बढ़ सके।
क्या था सरकार के प्रस्ताव का उद्देश्य?
प्रस्तावित संवैधानिक बदलाव का उद्देश्य लोकसभा की सदस्य संख्या बढ़ाने और महिला आरक्षण लागू करने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना था। प्रस्ताव में लोकसभा की अधिकतम सदस्य संख्या 850 तक करने और महिलाओं के लिए लोकसभा तथा राज्य विधानसभाओं में लगभग एक-तिहाई सीटें आरक्षित करने से जुड़े प्रावधान थे।
महिला आरक्षण का मौजूदा संवैधानिक प्रावधान 2023 के 106वें संविधान संशोधन से जुड़ा है। उसके तहत आरक्षण का क्रियान्वयन जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन की प्रक्रिया से संबंधित है। 2026 में प्रस्तावित बदलाव इसी प्रक्रिया और समयसीमा को बदलने की दिशा में था।
परिसीमन केवल सीटों की संख्या का विषय नहीं है। इसमें निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं तय करना और राज्यों के प्रतिनिधित्व से जुड़े सवाल भी शामिल हैं। इसी कारण इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों के बीच सहमति बनाना महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
खरगे ने प्रधानमंत्री को चौथी बार पत्र लिखने की बात कही
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने 16 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे पत्र में परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े प्रस्ताव पर सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग दोहराई। उनका कहना है कि इतने व्यापक संवैधानिक असर वाले विषय पर सभी राजनीतिक दलों से चर्चा होनी चाहिए और सरकार को एकतरफा तरीके से आगे नहीं बढ़ना चाहिए।
खरगे ने अपने पत्र में पहले किए गए पत्राचार का भी उल्लेख किया। कांग्रेस के अनुसार, उसने अप्रैल में विधेयक पेश किए जाने से पहले भी सर्वदलीय चर्चा की मांग की थी। बाद में 16 जुलाई और 27 अगस्त को भी इस विषय पर पत्र लिखे गए। कांग्रेस का तर्क है कि परिसीमन का असर लोकसभा क्षेत्रों की सीमाओं और राज्यों के प्रतिनिधित्व पर पड़ सकता है, इसलिए सभी दलों की चिंताओं को सुना जाना चाहिए।
रिजिजू का जवाब: सरकार ने अन्य दलों से चर्चा की
खरगे के पत्र के जवाब में केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने 19 अक्टूबर को कहा कि सरकार ने कांग्रेस से कई बार संपर्क किया था। उनके मुताबिक, उन्होंने मार्च और अप्रैल में कांग्रेस नेतृत्व को पत्र लिखे और खरगे तथा लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी से भी इस मुद्दे पर सहयोग मांगा था।
रिजिजू ने कहा कि कांग्रेस की ओर से चर्चा के लिए तारीख तय नहीं किए जाने के बाद सरकार ने अन्य राजनीतिक दलों के साथ बातचीत की। उनके बताए दलों में समाजवादी पार्टी, डीएमके, वाईएसआरसीपी, एनसीपी (एसपी), शिवसेना (यूबीटी), एआईएमआईएम और बीजेडी शामिल हैं। सरकार का पक्ष है कि प्रस्ताव पर चर्चा और समर्थन के लिए विपक्षी दलों को रचनात्मक भूमिका निभानी चाहिए।
इस तरह सरकार और कांग्रेस दोनों अपने-अपने रुख पर कायम हैं। कांग्रेस व्यापक और औपचारिक सर्वदलीय बैठक की मांग कर रही है, जबकि सरकार का कहना है कि वह पहले ही विभिन्न दलों से संपर्क कर चुकी है।
संसद का सत्रावसान नहीं होने पर भी उठे सवाल
खरगे ने मानसून सत्र का औपचारिक सत्रावसान नहीं किए जाने पर भी चिंता जताई। मानसून सत्र 13 अगस्त को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हुआ था। संसदीय प्रक्रिया में अनिश्चितकाल के लिए स्थगन और सत्रावसान अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। सत्रावसान राष्ट्रपति के आदेश से होता है, जबकि अनिश्चितकालीन स्थगन के बाद सदन की बैठक की अगली तारीख घोषित नहीं रहती।
रिजिजू ने जवाब में कहा कि संविधान में ऐसी कोई निश्चित समयसीमा निर्धारित नहीं है, जिसके भीतर स्थगित सत्र का सत्रावसान करना अनिवार्य हो। उनके अनुसार, केवल सत्रावसान में देरी से अपने आप संवैधानिक या प्रक्रियात्मक अनियमितता साबित नहीं होती।
हालांकि, सत्रावसान से जुड़ी प्रक्रिया और किसी विधेयक को दोबारा पेश करने का सवाल अलग-अलग हैं। अप्रैल में संविधान संशोधन विधेयक पारित नहीं हो सका था। उसे दोबारा लाने के लिए सरकार को आगे की विधायी प्रक्रिया अपनानी होगी।
क्या परिसीमन पर विपक्षी एकता प्रभावित होगी?
परिसीमन के मुद्दे पर विपक्षी दलों के बीच एक समान रुख बनाना आसान नहीं है। राज्यों के प्रतिनिधित्व, लोकसभा सीटों के वितरण और महिला आरक्षण के क्रियान्वयन को लेकर अलग-अलग दलों की प्राथमिकताएं हो सकती हैं। इसलिए किसी दल का सरकार के साथ बातचीत करना अपने आप विधेयक के समर्थन का संकेत नहीं है।
कांग्रेस को आशंका है कि सरकार अलग-अलग दलों से बातचीत कर व्यापक समर्थन जुटाने की कोशिश कर रही है। दूसरी ओर, सरकार इसे विपक्ष के साथ विचार-विमर्श और सहमति बनाने की प्रक्रिया बता रही है। फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि इस पहल से कांग्रेस अलग-थलग पड़ जाएगी या विपक्षी गठबंधन कमजोर हो जाएगा। इसका आकलन दलों के आधिकारिक रुख और आगे होने वाली संसदीय कार्रवाई के आधार पर ही किया जा सकेगा।
SIR और परिसीमन: दो अलग मुद्दे, राजनीतिक समीकरण साझा
SIR मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़ा मुद्दा है, जबकि परिसीमन निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं और प्रतिनिधित्व से संबंधित संवैधानिक प्रक्रिया है। दोनों मुद्दों पर विपक्षी दल सरकार से सवाल उठा रहे हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि सभी दल हर विषय पर एक जैसी रणनीति अपनाएंगे।
क्षेत्रीय दलों के लिए परिसीमन का महत्व उनके राज्यों के प्रतिनिधित्व और भविष्य के चुनावी समीकरणों से भी जुड़ा है। महिला आरक्षण को लेकर समर्थन और परिसीमन के तरीके को लेकर आपत्ति एक साथ मौजूद हो सकती है। इसलिए राजनीतिक दलों की बातचीत, प्रस्ताव की शर्तें और संसद में उनका अंतिम रुख आगे की स्थिति तय करेंगे।
फिलहाल सरकार की ओर से परिसीमन और महिला आरक्षण पर विपक्ष से सहयोग मांगने तथा कांग्रेस की ओर से सर्वदलीय बैठक पर जोर देने के बीच गतिरोध बना हुआ है। संसद का विशेष सत्र बुलाने की अटकलें जारी हैं, लेकिन नई बैठक की तारीख या विधेयक को दोबारा पेश करने की औपचारिक घोषणा की पुष्टि उपलब्ध जानकारी से नहीं होती।
