दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर चल रहे प्रदर्शनों में AISA की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा एक प्रमुख चेहरा बनकर उभरी हैं। 11 अक्टूबर को आरके आश्रम मेट्रो स्टेशन पर उनके जैसी दिखने वाली एक महिला को पुलिस ने हिरासत में ले लिया, जबकि नेहा कनॉट प्लेस में प्रदर्शन कर रही थीं। बाद में उन्हें विजय चौक के पास हिरासत में लिया गया।
अगले दिन 12 अक्टूबर को नेहा बोरा राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के साथ सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च में शामिल हुईं। लगातार बदलते प्रदर्शन स्थलों, पुलिस कार्रवाई और छात्र संगठनों की भागीदारी के बीच उनकी सक्रियता पर चर्चा हो रही है। नेहा की पृष्ठभूमि क्या है और उनकी प्रदर्शन शैली CJP के आंदोलन से किस तरह अलग बताई जा रही है?
कौन हैं नेहा बोरा?
नेहा बोरा उत्तराखंड के खटीमा की रहने वाली हैं। अक्टूबर 2026 की मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, उनकी उम्र 29 वर्ष है। वे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में थिएटर और परफॉर्मेंस स्टडीज से जुड़ी पीएचडी स्कॉलर हैं और ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।
उनकी पढ़ाई दिल्ली विश्वविद्यालय और डॉ. बी. आर. आंबेडकर विश्वविद्यालय से हुई। छात्र जीवन के दौरान उनका थिएटर से जुड़ाव बढ़ा और वे संगवारी थिएटर ग्रुप से भी जुड़ीं। नेहा ने अपने साक्षात्कारों में थिएटर को सीखने, अलग-अलग विचारों को समझने और रचनात्मक लोगों से जुड़ने का माध्यम बताया है।
नेहा की राजनीतिक सक्रियता को समझने के लिए उनके छात्र जीवन और नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध में हुए प्रदर्शनों का संदर्भ महत्वपूर्ण है। उनके मुताबिक, उस दौर में उन्होंने छात्रों को किताबों और चर्चाओं में मौजूद विचारों को सड़क पर होने वाले आंदोलनों से जोड़ते देखा। इसके बाद छात्र राजनीति में उनकी सक्रियता बढ़ती गई।
AISA की अध्यक्ष बनने के बाद बढ़ी सक्रियता
AISA वामपंथी विचारधारा से जुड़ा छात्र संगठन है, जिसकी स्थापना 1990 में हुई थी। यह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन से संबद्ध है। नेहा संगठन की राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में शिक्षा, छात्र अधिकारों और विभिन्न राजनीतिक मुद्दों पर होने वाले प्रदर्शनों में शामिल रही हैं।
फरवरी 2026 में JNU के कुलपति के खिलाफ प्रदर्शन के बाद नेहा को हिरासत में लिए जाने की खबरें आई थीं। बाद में उन्हें तिहाड़ जेल भेजे जाने और 1 मार्च को रिहा होने का विवरण भी उपलब्ध कराया गया है।
23 दिन की भूख हड़ताल से मिली राष्ट्रीय पहचान
जुलाई 2026 में नेहा बोरा और अन्य प्रदर्शनकारियों ने जंतर-मंतर पर 23 दिन तक भूख हड़ताल की। यह आंदोलन पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग से जुड़ा था। इसी दौरान पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक भी भूख हड़ताल पर थे। इस आंदोलन ने नेहा को JNU परिसर से बाहर व्यापक पहचान दिलाने में भूमिका निभाई।
इसके बाद वे अलग-अलग शहरों में छात्र आंदोलनों और परीक्षाओं से जुड़े विरोध प्रदर्शनों में शामिल हुईं। झारखंड में JPSC और JSSC-CGL परीक्षाओं से जुड़े विरोध के दौरान भी उनकी मौजूदगी की खबरें आईं। इन घटनाओं ने उन्हें छात्र अधिकारों और युवा राजनीति से जुड़े आंदोलनों में सक्रिय चेहरा बनाया।
गोरखपुर में बयान और FIR का मामला
सितंबर 2026 में गोरखपुर में आयोजित एक छात्र जुटान के दौरान नेहा बोरा ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर तीखी राजनीतिक टिप्पणी की थी। इस बयान को लेकर उनके खिलाफ उत्तर प्रदेश में तीन FIR दर्ज होने का दावा किया गया है।
CEC के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन
अक्टूबर में AISA और CJP समेत कई संगठनों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर दिल्ली में प्रदर्शन किए। विरोध का एक प्रमुख मुद्दा मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर उठाए गए सवाल हैं। प्रदर्शनकारी चुनाव प्रक्रिया और मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं पर सवाल उठा रहे हैं।
चुनाव आयोग की निष्पक्षता और मतदाता सूची में बदलाव को लेकर उठाए गए आरोपों को स्थापित तथ्य की तरह पेश नहीं किया जाना चाहिए। इन आरोपों और संबंधित संस्थाओं के जवाब को अलग-अलग समझना जरूरी है।
4 अक्टूबर को अशोका रोड पर हुए प्रदर्शन के दौरान नेहा बोरा के पुलिस बैरिकेड पर चढ़ने की तस्वीरें सामने आई थीं। 10 और 11 अक्टूबर को प्रदर्शनकारियों ने पुलिस की रोक के बीच वैकल्पिक स्थानों पर जुटने की कोशिश की। 11 अक्टूबर को नेहा के बताए गए प्रदर्शन स्थल और उनकी वास्तविक मौजूदगी के बीच भ्रम की स्थिति बनी, जिसके बाद दूसरी महिला को हिरासत में लिए जाने की घटना चर्चा में आई।
नेहा बोरा और CJP की रणनीति में क्या अंतर बताया जा रहा है?
नेहा बोरा और CJP के नेता अभिजीत दीपके दोनों ही मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग से जुड़े आंदोलनों में सक्रिय रहे हैं। उपलब्ध घटनाक्रम के आधार पर उनकी कार्यशैली में कुछ अंतर बताए जा रहे हैं। हालांकि, इन्हें दोनों संगठनों की हर गतिविधि पर लागू होने वाला स्थायी नियम नहीं माना जा सकता।
1. प्रदर्शन स्थल और समय में बदलाव
नेहा और AISA ने कुछ मौकों पर प्रदर्शन स्थल की घोषणा सोशल मीडिया के जरिए की और पुलिस की रोक के बाद दूसरे स्थान पर जुटने की अपील की। 10 अक्टूबर को जंतर-मंतर के आसपास प्रदर्शनकारियों को रोके जाने के बाद कुछ लोग INA और दिल्ली हाट की ओर गए। यह घटनाक्रम दिखाता है कि प्रदर्शनकारियों ने परिस्थितियों के अनुसार स्थान बदलने की कोशिश की।
CJP ने भी अपने आंदोलन की तारीखों और मांगों की सार्वजनिक घोषणा की थी। पहले से कार्यक्रम घोषित करने से समर्थकों को जुटाने में मदद मिल सकती है, लेकिन इससे पुलिस को भी तैयारी करने का अवसर मिलता है।
2. पुलिस कार्रवाई के बीच प्रदर्शन जारी रखना
11 अक्टूबर को आरके आश्रम और कनॉट प्लेस में हुई घटनाओं में पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया। नेहा कनॉट प्लेस में प्रदर्शन करती दिखीं और बाद में उन्हें विजय चौक के पास हिरासत में लिया गया। इस घटनाक्रम ने उन्हें मीडिया और सोशल मीडिया की चर्चा में ला दिया।
CJP के नेता अभिजीत दीपके और उनके समर्थक भी अक्टूबर में प्रदर्शन के दौरान हिरासत में लिए गए थे। दोनों पक्षों की गतिविधियों में पुलिस कार्रवाई के बाद आंदोलन जारी रखने की कोशिशें दिखाई देती हैं।
3. लगातार प्रदर्शन बनाम अगली रणनीति की घोषणा
नेहा ने हिरासत के दौरान और उसके बाद समर्थकों को प्रदर्शन जारी रखने की अपील की। दूसरी ओर, CJP ने भी मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग को लेकर आंदोलन जारी रखने की बात कही है। दोनों की सार्वजनिक अपीलों, कार्यक्रमों और अगले कदमों में अंतर हो सकता है, लेकिन यह अंतर समय के साथ बदल भी सकता है।
7 अक्टूबर की प्रेस कॉन्फ्रेंस में नेहा बोरा और CJP के नेताओं की साथ मौजूदगी को लेकर सोशल मीडिया पर तुलना हुई थी। नेहा ने तुलना के बजाय एकता पर जोर दिया था।
नेहा की पहचान: छात्र राजनीति, थिएटर और सार्वजनिक प्रदर्शन
नेहा बोरा की सार्वजनिक छवि केवल पुलिस के साथ टकराव या प्रदर्शन की तस्वीरों तक सीमित नहीं है। उनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि, थिएटर से जुड़ाव और छात्र संगठनों में काम ने भी उनकी राजनीतिक यात्रा को आकार दिया है। उनके समर्थक उन्हें युवा आंदोलनों का प्रमुख चेहरा मानते हैं, जबकि उनकी राजनीतिक रणनीति और बयानों पर अलग-अलग विचार भी सामने आते हैं।
12 अक्टूबर को राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के साथ सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च में उनकी भागीदारी ने उन्हें विपक्षी दलों और छात्र संगठनों के साझा प्रदर्शन के संदर्भ में भी चर्चा में ला दिया। इस आंदोलन की आगे की दिशा प्रदर्शनकारियों की मांगों, संबंधित संस्थाओं की प्रतिक्रिया और आने वाले राजनीतिक घटनाक्रम पर निर्भर करेगी।
