पितृ पक्ष 2026 में 2 अक्टूबर, शुक्रवार को सप्तमी श्राद्ध किया जाएगा। यह श्राद्ध उन पितरों के लिए माना जाता है जिनका निधन सप्तमी तिथि को हुआ हो। पंचांग के अनुसार 2 अक्टूबर को सुबह 10:15 बजे तक कृष्ण पक्ष षष्ठी रहेगी और इसके बाद सप्तमी तिथि शुरू होगी, जो 3 अक्टूबर सुबह 7:59 बजे तक रहेगी।
सप्तमी श्राद्ध में तर्पण, पिंडदान, पंचबलि, ब्राह्मण भोजन और दान जैसी परंपराएं महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। श्राद्ध का मुख्य कर्म सामान्यतः कुतुप, रौहिण और अपराह्न काल में किया जाता है। स्थानीय सूर्योदय के अनुसार इन मुहूर्तों में अंतर हो सकता है।
2 अक्टूबर को कौन सा श्राद्ध होगा?
2 अक्टूबर 2026 को आश्विन कृष्ण सप्तमी का श्राद्ध होगा। इसे सप्तमी श्राद्ध कहा जाता है। सप्तमी तिथि सुबह 10:15 बजे शुरू होगी और 3 अक्टूबर सुबह 7:59 बजे समाप्त होगी।
इस दिन मुख्य रूप से उन पूर्वजों का श्राद्ध किया जाता है जिनकी मृत्यु सप्तमी तिथि को हुई थी।
सप्तमी श्राद्ध 2026 का मुहूर्त
मुहूर्त स्थान के अनुसार बदलता है। दिल्ली में 2 अक्टूबर को कुतुप मुहूर्त सुबह 11:46 से दोपहर 12:34 बजे तक, रौहिण मुहूर्त दोपहर 12:34 से 1:21 बजे तक और अपराह्न काल दोपहर 1:21 से 3:44 बजे तक बताया गया है।
मध्य प्रदेश के खजुराहो क्षेत्र में कुतुप मुहूर्त लगभग 11:36 से 12:23 बजे, रौहिण 12:23 से 1:11 बजे और अपराह्न काल 1:11 से 3:34 बजे तक है। इसलिए रीवा, भोपाल या किसी दूसरे शहर में रहने वाले परिवार स्थानीय पंचांग के अनुसार समय तय करें।
सप्तमी श्राद्ध की पूजा विधि
स्नान और संकल्प
सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें। पूजा स्थल को साफ करें और पूर्वज का स्मरण करते हुए संकल्प लें।
पितरों का स्मरण
पितर का नाम, गोत्र और संबंधित तिथि का स्मरण करके श्राद्ध कर्म शुरू किया जाता है। यदि गोत्र या तिथि को लेकर भ्रम हो तो परिवार के जानकार या पुरोहित से सलाह लेना उचित है।
पिंडदान
परंपरा के अनुसार चावल, तिल आदि से पिंड बनाए जाते हैं। इन्हें विधि के अनुसार पितरों को समर्पित किया जाता है।
तर्पण
जल में काले तिल और अन्य निर्धारित सामग्री मिलाकर पितरों के लिए तर्पण किया जाता है। श्राद्ध कर्म के अंत में तर्पण किए जाने की परंपरा बताई गई है।
पंचबलि
परंपरा के अनुसार गाय, कुत्ते, कौए आदि के लिए भोजन का अंश निकालकर पंचबलि की जाती है। अलग-अलग परिवारों और क्षेत्रों में इसकी विधि में अंतर हो सकता है।
ब्राह्मण भोजन और दान
श्राद्ध कर्म के बाद ब्राह्मण भोजन तथा अपनी सामर्थ्य के अनुसार अन्न, वस्त्र या दक्षिणा का दान करने की परंपरा है।
सप्तमी श्राद्ध का मंत्र
पितृ तर्पण के दौरान सामान्य रूप से ॐ पितृभ्यः स्वधा नमः मंत्र का जाप किया जा सकता है। परिवार की परंपरा में कोई विशेष मंत्र या संकल्प हो तो उसे पुरोहित के निर्देश के अनुसार किया जा सकता है।
श्राद्ध के लिए जरूरी सामग्री
- काले तिल
- अक्षत या चावल
- कुश
- जल
- पिंड के लिए चावल
- दूध, घी और शहद
- फूल और फल
- दीपक और धूप
- पत्तल या पूजा पात्र
- भोजन सामग्री
- दान के लिए अन्न, वस्त्र या दक्षिणा
सप्तमी श्राद्ध में क्या सावधानी रखें?
- श्राद्ध का समय स्थानीय पंचांग से जांचें।
- पितर की मृत्यु तिथि ज्ञात है तो उसी तिथि के अनुसार श्राद्ध करें।
- भोजन और पूजा सामग्री की बर्बादी न करें।
- श्राद्ध कर्म को दिखावे के बजाय श्रद्धा से करने की परंपरा है।
- परिवार की परंपरा के अनुसार सात्त्विक भोजन रखा जाता है।
- शराब और मांसाहार से परहेज करने की परंपरा कई परिवारों में है।
- तिथि, गोत्र या कर्मकांड को लेकर भ्रम हो तो पुरोहित से सलाह लें।
अगर पितर की मृत्यु तिथि पता नहीं है तो?
यदि किसी पूर्वज की मृत्यु की तिथि ज्ञात नहीं है, तो पितृ पक्ष के अंतिम दिन सर्वपितृ अमावस्या पर सामूहिक श्राद्ध करने की परंपरा है। 2026 में सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर को होगी।
इसलिए केवल सप्तमी होने के कारण किसी ऐसे पितर का श्राद्ध सप्तमी पर करना जरूरी नहीं है जिसकी वास्तविक मृत्यु तिथि अलग थी।
आगे कब होगा श्राद्ध?
पितृ पक्ष में सप्तमी के बाद 3 अक्टूबर को अष्टमी, 4 अक्टूबर को नवमी, 5 अक्टूबर को दशमी, 6 अक्टूबर को एकादशी, 7 अक्टूबर को द्वादशी, 8 अक्टूबर को त्रयोदशी, 9 अक्टूबर को चतुर्दशी और 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या होगी।
