5 अक्टूबर 2026, सोमवार को पितृ पक्ष की दशमी तिथि का श्राद्ध किया जाएगा। यह श्राद्ध उन पितरों के लिए किया जाता है जिनकी मृत्यु की तिथि हिंदू पंचांग के अनुसार दशमी थी। रीवा के पंचांग के अनुसार 5 अक्टूबर को दशमी तिथि तड़के 3 बजकर 54 मिनट से शुरू होकर 6 अक्टूबर की रात 2 बजकर 8 मिनट तक रहेगी।
5 अक्टूबर दशमी श्राद्ध का मुहूर्त
पितृ पक्ष के श्राद्ध कर्म के लिए दिन के कुतुप, रौहिण और अपराह्न काल को महत्वपूर्ण माना जाता है। रीवा के लिए उपलब्ध पंचांग गणना के अनुसार 5 अक्टूबर को कुतुप मुहूर्त दोपहर करीब 12:02 बजे से 12:50 बजे तक और रौहिण मुहूर्त करीब 12:50 बजे से 1:37 बजे तक रहेगा। इसके बाद अपराह्न काल करीब 1:37 बजे से शाम 4 बजे तक रहेगा। स्थान के अनुसार कुछ मिनट का अंतर हो सकता है।
दशमी श्राद्ध किसके लिए किया जाता है?
दशमी श्राद्ध उस पितर के लिए किया जाता है जिनका निधन दशमी तिथि को हुआ हो। पितृ पक्ष में श्राद्ध सामान्य रूप से संबंधित पितर की मृत्यु तिथि के अनुसार किया जाता है। यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है, तो परंपरा में सर्वपितृ अमावस्या पर श्राद्ध करने की व्यवस्था बताई गई है।
दशमी श्राद्ध की सरल विधि
सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें और श्राद्ध कर्म के लिए स्थान को साफ करें। परिवार की परंपरा के अनुसार पितरों का स्मरण करके संकल्प लें। श्राद्ध कर्म में कुश, तिल, जल और पिंड के लिए आवश्यक सामग्री तैयार रखें।
इसके बाद पितरों के निमित्त पिंड अर्पित किए जाते हैं। पिंड सामान्य रूप से चावल, तिल और अन्य परंपरागत सामग्री से बनाए जाते हैं। परिवार की कुल परंपरा या पुरोहित के निर्देश के अनुसार सामग्री में बदलाव हो सकता है।
पिंडदान के बाद तर्पण किया जाता है। तिल मिश्रित जल को श्रद्धापूर्वक पितरों के निमित्त अर्पित किया जाता है। इसके बाद ब्राह्मण भोजन, भोजन का दान और जरूरतमंदों को यथाशक्ति दान करने की परंपरा है।
तर्पण करते समय कौन सा मंत्र बोलें?
तर्पण के दौरान पितरों का स्मरण करते हुए सरल रूप से यह मंत्र बोला जा सकता है:
ॐ पितृभ्यः स्वधा नमः।
पितरों के नाम और गोत्र का स्मरण करके जल अर्पित किया जा सकता है। यदि परिवार में कोई विशेष श्राद्ध मंत्र या परंपरा चली आ रही है, तो उसी के अनुसार कर्म करना अधिक उचित माना जाता है।
पिंडदान के समय क्या करें?
- पितरों का नाम और गोत्र स्मरण करें।
- श्रद्धा और शांत मन से पिंड अर्पित करें।
- काले तिल और जल से तर्पण करें।
- परिवार की परंपरा के अनुसार ब्राह्मण भोजन कराएं।
- अपनी क्षमता के अनुसार अन्न, वस्त्र या अन्य उपयोगी वस्तुओं का दान करें।
5 अक्टूबर को श्राद्ध में क्या नहीं करना चाहिए?
- श्राद्ध कर्म में जल्दबाजी या दिखावे से बचें।
- नशे और मांसाहार से दूर रहने की परंपरा का पालन करें।
- परिवार की श्राद्ध परंपरा के विपरीत अपनी ओर से कोई विशेष कर्म न जोड़ें।
- पितरों के निमित्त किए जाने वाले कर्म के दौरान विवाद और क्रोध से बचें।
- मुहूर्त और तिथि को लेकर भ्रम होने पर स्थानीय पंचांग या पुरोहित से पुष्टि करें।
श्राद्ध में तर्पण का महत्व
हिंदू धार्मिक परंपरा में तर्पण को पितरों के प्रति श्रद्धा और स्मरण के रूप में देखा जाता है। पितृ पक्ष के दौरान परिवार के लोग अपने पूर्वजों को याद करते हुए जल और तिल अर्पित करते हैं। श्राद्ध कर्म का मुख्य भाव पितरों के प्रति सम्मान, कृतज्ञता और स्मरण है।
मुहूर्त में स्थानीय अंतर संभव
श्राद्ध के मुहूर्त सूर्योदय और स्थानीय भौगोलिक स्थिति के आधार पर बदल सकते हैं। इसलिए रीवा के अलावा किसी दूसरे शहर में श्राद्ध करने वाले लोग अपने स्थानीय पंचांग के समय को प्राथमिकता दें। उपलब्ध पंचांगों में भी अलग-अलग शहरों के लिए कुतुप और रौहिण मुहूर्त में कुछ मिनट का अंतर दिखाई देता है।
