पितृ पक्ष 2026 में 3 अक्टूबर, शनिवार को अष्टमी श्राद्ध किया जाएगा। हिंदू पंचांग के अनुसार इस दिन उन पूर्वजों का श्राद्ध किया जाता है जिनका निधन अष्टमी तिथि को हुआ हो। श्राद्ध कर्म में तर्पण, पिंडदान, भोजन और दान जैसी परंपराएं परिवार और क्षेत्र की मान्यताओं के अनुसार निभाई जाती हैं।
पंचांग गणना के अनुसार अष्टमी तिथि 3 अक्टूबर को सुबह 7:59 बजे शुरू होगी और 4 अक्टूबर को सुबह 5:51 बजे समाप्त होगी। श्राद्ध के लिए कुतुप, रौहिण और अपराह्न काल को महत्वपूर्ण माना जाता है। अलग-अलग शहरों में सूर्योदय और स्थानीय पंचांग के अंतर के कारण इन समयों में कुछ मिनट का बदलाव हो सकता है।
3 अक्टूबर को अष्टमी श्राद्ध का मुहूर्त
अष्टमी श्राद्ध के लिए उपलब्ध पंचांग गणना के अनुसार कुतुप मुहूर्त सुबह 11:36 बजे से दोपहर 12:24 बजे तक रहेगा। इसके बाद रौहिण मुहूर्त दोपहर 12:24 बजे से करीब 1:12 बजे तक रहेगा। इसके बाद अपराह्न काल में भी श्राद्ध कर्म किया जा सकता है।
- अष्टमी तिथि शुरू: 3 अक्टूबर, सुबह 7:59 बजे
- अष्टमी तिथि समाप्त: 4 अक्टूबर, सुबह 5:51 बजे
- कुतुप मुहूर्त: सुबह 11:36 बजे से दोपहर 12:24 बजे तक
- रौहिण मुहूर्त: दोपहर 12:24 बजे से 1:12 बजे तक
- अपराह्न काल: दोपहर 1:12 बजे से करीब 3:36 बजे तक
श्राद्ध के मुहूर्त में शहर के अनुसार अंतर हो सकता है। इसलिए रीवा, भोपाल, जबलपुर, इंदौर या किसी अन्य शहर में कर्मकांड करने वाले लोग अपने स्थानीय पंचांग के समय को प्राथमिकता दें।
अष्टमी श्राद्ध किन पितरों के लिए किया जाता है?
अष्टमी श्राद्ध उन दिवंगत परिजनों के लिए किया जाता है जिनका निधन अष्टमी तिथि को हुआ हो। श्राद्ध कर्म सामान्य तौर पर मृत्यु की तिथि के अनुसार किया जाता है। यदि किसी पूर्वज की मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है, तो उनके लिए पितृ पक्ष की सर्वपितृ अमावस्या पर श्राद्ध करने की परंपरा है।
अष्टमी श्राद्ध की विधि
श्राद्ध कर्म शुरू करने से पहले स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें और पूजा स्थल को साफ करें। इसके बाद अपने पितरों का स्मरण करके संकल्प लिया जाता है। श्राद्ध की पूरी विधि परिवार की परंपरा और संबंधित आचार्य के निर्देश के अनुसार करना उचित माना जाता है।
- सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- पितरों का स्मरण करके श्राद्ध का संकल्प लें।
- कुश और काले तिल के साथ जल से तर्पण करें।
- पितरों के नाम और गोत्र का स्मरण करते हुए जल अर्पित करें।
- परंपरा के अनुसार चावल, तिल और घी से पिंड तैयार कर अर्पित करें।
- ब्राह्मण भोजन और सामर्थ्य के अनुसार दान करें।
- परंपरा के अनुसार गाय, कुत्ते और कौवे के लिए भोजन निकालें।
- अंत में पितरों से प्रार्थना करके श्राद्ध कर्म पूर्ण करें।
तर्पण के दौरान दक्षिण दिशा की ओर मुख करने और जल में काले तिल तथा कुश का उपयोग करने की परंपरा बताई जाती है। तर्पण की संख्या और पूरी प्रक्रिया कुल परंपरा के अनुसार अलग हो सकती है।
अष्टमी श्राद्ध में कौन-सा मंत्र बोलें?
तर्पण के दौरान सरल पितृ मंत्र का जाप किया जा सकता है। एक प्रचलित मंत्र है:
“ॐ पितृभ्यः स्वधा नमः।”
इसके अलावा श्राद्ध कर्म में यह मंत्र भी प्रचलित है:
“ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च।
नमः स्वधायै स्वाहायै नित्यमेव नमो नमः॥”
मंत्रों का उच्चारण परिवार की परंपरा और आचार्य के निर्देश के अनुसार किया जा सकता है।
अष्टमी श्राद्ध में क्या करें?
- पितरों का श्रद्धापूर्वक स्मरण करें।
- काले तिल और कुश के साथ तर्पण करें।
- पितरों के नाम और गोत्र का स्मरण करें।
- सात्विक भोजन तैयार करें।
- परंपरा के अनुसार ब्राह्मण भोजन और दान करें।
- जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र या सामर्थ्य के अनुसार दान करें।
- घर में शांत और सात्विक वातावरण रखें।
श्राद्ध के दिन क्या नहीं करना चाहिए?
पितृ पक्ष के दौरान धार्मिक परंपराओं में सात्विक आचरण पर जोर दिया जाता है। मांसाहार और मदिरा से दूर रहने तथा क्रोध, विवाद और अनावश्यक हिंसा से बचने की सलाह दी जाती है। कई परंपराओं में श्राद्धकर्ता के लिए तेल-मर्दन, यात्रा, अति-परिश्रम और अन्य कुछ गतिविधियों को वर्जित माना गया है। इन नियमों में क्षेत्र और परिवार की परंपरा के अनुसार अंतर हो सकता है।
- मांसाहार और मदिरा का सेवन न करें।
- अनावश्यक विवाद और क्रोध से बचें।
- श्राद्ध के दौरान दिखावे या अनावश्यक खर्च से बचें।
- परिवार की परंपरा के विरुद्ध कोई कर्मकांड स्वयं से न बदलें।
- विशेष मंत्र या जटिल विधि का ज्ञान न हो तो योग्य आचार्य से मार्गदर्शन लें।
पितृ पक्ष 2026 में आगे की श्राद्ध तिथियां
अष्टमी श्राद्ध के बाद 4 अक्टूबर को नवमी श्राद्ध, 5 अक्टूबर को दशमी, 6 अक्टूबर को एकादशी, 7 अक्टूबर को द्वादशी, 8 अक्टूबर को त्रयोदशी, 9 अक्टूबर को चतुर्दशी और 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या का श्राद्ध होगा।
श्राद्ध कर्म हमेशा मृत्यु की तिथि के अनुसार करने की परंपरा है। इसलिए अपने परिवार के पितृ की सही तिथि के अनुसार ही श्राद्ध करना चाहिए। तिथि या विधि को लेकर भ्रम होने पर स्थानीय पंचांग और योग्य आचार्य की सलाह लेना उचित रहेगा।
