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स्कूल में हिजाब की अलग अनुमति नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा- सभी छात्रों के लिए यूनिफॉर्म नियम जरूरी

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प्रयागराज | इलाहाबाद हाईकोर्ट: स्कूल में हिजाब की अलग अनुमति नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा- सभी छात्रों के लिए यूनिफॉर्म नियम जरूरी
स्कूल में हिजाब की अलग अनुमति नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा- सभी छात्रों के लिए यूनिफॉर्म नियम जरूरीसाभार: The City Express

मुख्य बिंदुQuick Read

  • इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हिजाब के साथ स्कूल ड्रेस कोड में अलग छूट देने की मांग वाली याचिका खारिज की।
  • कोर्ट ने कहा कि सभी छात्रों पर समान रूप से लागू ड्रेस कोड तय करने का अधिकार स्कूल प्रशासन के पास है।
  • छात्रा का कहना था कि वह पहले कई वर्षों तक हिजाब पहनकर स्कूल जाती रही, लेकिन 11वीं में अनुमति नहीं मिली।
  • सुप्रीम कोर्ट में कर्नाटक हिजाब विवाद पर दो जजों की बेंच का फैसला 2022 में विभाजित रहा था।

नई दिल्ली / प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्कूल में तय यूनिफॉर्म के साथ व्यक्तिगत आधार पर हिजाब पहनने की अनुमति देने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि यदि किसी स्कूल का ड्रेस कोड सभी छात्रों पर समान रूप से लागू है और उसमें भेदभाव नहीं किया गया है, तो किसी एक छात्र या छात्रा को अलग छूट देने की मांग स्वीकार नहीं की जा सकती।

जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की डिविजन बेंच ने नाबालिग छात्रा की याचिका खारिज कर दी। छात्रा ने अपनी मां के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर स्कूल की तय ड्रेस के साथ हिजाब पहनकर कक्षा में बैठने की अनुमति मांगी थी।

कोर्ट बोला- यूनिफॉर्म से बनता है समानता का माहौल

हाईकोर्ट ने कहा कि स्कूल यूनिफॉर्म का उद्देश्य केवल एक जैसा पहनावा तय करना नहीं है। इससे छात्रों के बीच समानता की भावना बनी रहती है और संस्थान में धार्मिक या व्यक्तिगत पहचान के आधार पर अलगाव की स्थिति पैदा नहीं होती।

कोर्ट के अनुसार, स्कूल के अनुशासन और ड्रेस कोड को तय करने का अधिकार संस्थान के पास है। कोई छात्र या छात्रा व्यक्तिगत आधार पर उस ड्रेस कोड में बदलाव की जिद नहीं कर सकता।

“स्कूल में व्यक्तिगत आधार पर हिजाब पहनने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। यह यूनिफॉर्म के विचार के खिलाफ होगा। इससे स्कूल के अनुशासन को तय करने का अधिकार संस्थान के बजाय अलग-अलग छात्रों के हाथ में चला जाएगा।”

छात्रा ने कहा- पहले हिजाब पहनने पर कोई आपत्ति नहीं हुई

मामला प्रयागराज के एक निजी स्कूल में 11वीं कक्षा में पढ़ने वाली छात्रा से जुड़ा था। छात्रा का कहना था कि वह कक्षा 6 से लेकर 10वीं तक हिजाब पहनकर स्कूल जाती रही और इस दौरान स्कूल प्रशासन ने कोई आपत्ति नहीं जताई।

याचिका में छात्रा ने पुराने पहचान पत्र और स्कूल की ग्रुप फोटो भी प्रस्तुत की थी। उसका कहना था कि 11वीं कक्षा में भी वह हिजाब पहनकर पढ़ाई जारी रखना चाहती है, लेकिन अब उसे इसकी अनुमति नहीं दी जा रही है।

मामले को लेकर जिला प्रशासन के समक्ष भी शिकायत की गई थी। इसके बाद जिला विद्यालय निरीक्षक से रिपोर्ट मांगी गई। स्कूल प्रबंधन का पक्ष था कि संस्थान में सभी छात्रों के लिए एक समान ड्रेस कोड लागू है और किसी एक छात्रा को अलग छूट देने से व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।

पुरानी छूट को स्थायी अधिकार नहीं माना जा सकता

हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी संस्थान ने पहले किसी छात्रा को हेडस्कार्फ या हिजाब पहनने की अनुमति दी थी, तो केवल इस आधार पर उसे हमेशा के लिए कानूनी अधिकार नहीं माना जा सकता।

कोर्ट के अनुसार, स्कूल प्रशासन अपने नियमों में बदलाव करने के लिए स्वतंत्र है, बशर्ते नया नियम सभी छात्रों पर समान रूप से लागू हो और उसमें किसी प्रकार का भेदभाव न हो।

ड्रेस कोड तय करने का अधिकार स्कूल प्रशासन के पास

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि जब किसी स्कूल का ड्रेस कोड सभी बच्चों के लिए समान हो, सही उद्देश्य से बनाया गया हो और किसी समुदाय या छात्र के साथ भेदभाव न करता हो, तब ड्रेस से जुड़े नियम तय करने का अधिकार स्कूल प्रशासन के पास रहेगा।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि संस्थागत अनुशासन और स्कूल की सामूहिक व्यवस्था को व्यक्तिगत पसंद के ऊपर प्राथमिकता दी जा सकती है, खासकर तब जब नियम सभी छात्रों के लिए समान हों।

हिजाब विवाद की शुरुआत कर्नाटक से कैसे हुई?

स्कूल और कॉलेजों में हिजाब को लेकर बड़ा विवाद जनवरी 2022 में कर्नाटक के उडुपी से सामने आया था। कुछ छात्राओं ने हिजाब पहनकर कक्षा में बैठने की अनुमति मांगी थी, जबकि संस्थान ने इसे तय यूनिफॉर्म नियम के खिलाफ बताया था।

मामला बाद में कर्नाटक हाईकोर्ट पहुंचा। 15 मार्च 2022 को कर्नाटक हाईकोर्ट ने छात्राओं की याचिकाएं खारिज करते हुए कहा था कि संस्थान अपने तय ड्रेस कोड को लागू कर सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट में 2022 में बंटी थी जजों की राय

कर्नाटक हिजाब मामले में सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच ने 13 अक्टूबर 2022 को अलग-अलग राय दी थी। जस्टिस हेमंत गुप्ता ने कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखने की राय दी थी, जबकि जस्टिस सुधांशु धूलिया ने छात्राओं के पक्ष में अलग दृष्टिकोण रखा था।

जस्टिस धूलिया ने अपने फैसले में कहा था कि मामले को छात्रा की पसंद और शिक्षा तक पहुंच के अधिकार के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए। चूंकि दोनों जजों की राय एकमत नहीं थी, इसलिए उस बेंच से एक समान निर्णय नहीं निकल सका।

अनुच्छेद 19 और 25 का भी दिया गया था हवाला

याचिकाकर्ता की ओर से हिजाब पहनने को व्यक्तिगत स्वतंत्रता और धार्मिक मान्यता से जोड़ते हुए संविधान के अनुच्छेद 19 और अनुच्छेद 25 का हवाला दिया गया था।

अनुच्छेद 19 नागरिकों को कुछ मौलिक स्वतंत्रताएं देता है, जबकि अनुच्छेद 25 धर्म को मानने और उसका पालन करने की स्वतंत्रता से संबंधित है। हालांकि ये अधिकार पूर्ण या असीमित नहीं हैं और कानून तथा अन्य संवैधानिक प्रावधानों के अधीन हो सकते हैं।

कोर्ट का निष्कर्ष- आस्था पर रोक नहीं, यूनिफॉर्म का पालन जरूरी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले को छात्रा की धार्मिक आस्था पर रोक के रूप में नहीं देखा जा सकता। स्कूल केवल अपने संस्थागत नियम और सभी छात्रों के लिए लागू ड्रेस कोड का पालन कराना चाहता है।

इसी आधार पर डिविजन बेंच ने छात्रा की याचिका खारिज कर दी और स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत आधार पर स्कूल के तय यूनिफॉर्म नियम में बदलाव की मांग स्वीकार नहीं की जा सकती।

नोट: यह खबर उपलब्ध न्यायिक फैसले और प्रस्तुत मामले के तथ्यों के आधार पर तैयार की गई है। हिजाब और ड्रेस कोड से जुड़े संवैधानिक व कानूनी प्रश्नों पर अलग-अलग मामलों में न्यायिक परिस्थितियां भिन्न हो सकती हैं।

संपादकीय लेखक एवं रिपोर्टर
सत्यापित रिपोर्टर
विशेष संवाददाता

मध्य प्रदेश, विंध्य, बुंदेलखंड और राष्ट्रीय घटनाक्रमों पर द सिटी एक्सप्रेस की विशेष रिपोर्टिंग टीम।

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