नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को तत्काल निलंबित करने का अंतरिम आदेश देने से इनकार कर दिया। यह मामला चुनाव आयोग की ओर से चलाए जा रहे Special Intensive Revision (SIR) और उससे जुड़े फैसलों में कथित एकतरफा निर्णय लेने के आरोपों से जुड़ा है।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने केंद्र सरकार, चुनाव आयोग, CEC ज्ञानेश कुमार और अन्य संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी किया है। जवाब दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया गया है।
अखबार की खबर के आधार पर निलंबन का आदेश नहीं
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल किसी समाचार रिपोर्ट के आधार पर अंतरिम कार्रवाई नहीं की जा सकती। अदालत को पहले चुनाव आयोग का जवाब और संबंधित रिकॉर्ड देखना होगा।
याचिकाकर्ताओं की ओर से SIR से जुड़े कई फैसलों को लेकर सवाल उठाए गए थे। इन फैसलों को लेकर आरोप है कि अन्य दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों के बावजूद कुछ निर्णय लिए गए। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने अभी यह नहीं माना है कि सभी संबंधित फैसले CEC ने अकेले लिए थे।
फैसले सर्वसम्मति या बहुमत से होने चाहिए
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान इस बात पर जोर दिया कि बहु-सदस्यीय चुनाव आयोग में फैसले आयोग की संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार लिए जाने चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड देखने के बाद यह जांचा जाएगा कि संबंधित फैसले सर्वसम्मति या बहुमत के आधार पर लिए गए थे या नहीं।
अदालत ने संकेत दिया कि अगर रिकॉर्ड से यह सामने आता है कि किसी फैसले के लिए जरूरी प्रक्रिया या सहमति का पालन नहीं हुआ था, तो उस फैसले पर दोबारा विचार किया जा सकता है।
संशोधित Form-6 पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुनवाई का एक अहम हिस्सा मतदाता पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले Form-6 में किए गए बदलाव से जुड़ा रहा। CJI सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि संशोधित Form-6 को सुप्रीम कोर्ट ने मंजूरी नहीं दी थी।
अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड सामने आने के बाद वह यह देखना चाहेगी कि Form-6 में बदलाव किस स्तर पर और किसके जरिए किया गया।
यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि SIR के दौरान Form-6 के साथ लगाए गए अतिरिक्त घोषणा-पत्र को लेकर पहले से विवाद चल रहा है। चुनाव आयोग ने सितंबर में कहा था कि SIR से संबंधित प्रक्रिया में इस्तेमाल होने वाले इस प्रारूप को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के संदर्भ में लागू किया गया था। अब अदालत ने इस दावे और संबंधित रिकॉर्ड की जांच करने की बात कही है।
किन लोगों को नोटिस जारी हुआ?
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के अलावा चुनाव आयुक्त डॉ. सुखबीर सिंह संधू और डॉ. विवेक जोशी को भी नोटिस जारी किया है। डिप्टी इलेक्शन कमिश्नर मनीष गर्ग और DG (IT) सीमा खन्ना को भी नोटिस में शामिल किया गया है।
SIR को लेकर दो याचिकाएं
इस मामले में दो याचिकाएं दाखिल की गई हैं। राकेश कुमार सिंह की याचिका में CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कार्रवाई और निलंबन की मांग की गई है। उनकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने दलीलें रखीं। दूसरी याचिका शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की है, जिसकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी पेश हुईं।
याचिकाओं में SIR से जुड़े चुनाव आयोग के फैसलों और चुनावी प्रक्रिया से संबंधित कई मुद्दों पर अदालत से हस्तक्षेप की मांग की गई है।
CEC को हटाने की संवैधानिक व्यवस्था क्या है?
संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को उसी तरीके और उन्हीं आधारों पर पद से हटाया जा सकता है, जिस तरह सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाया जाता है। 2023 के कानून में भी मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए यही संवैधानिक सुरक्षा दोहराई गई है।
इसलिए किसी याचिका में आरोप लगाए जाने मात्र से CEC का पद समाप्त नहीं होता। मौजूदा सुनवाई में भी सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल निलंबन का आदेश देने के बजाय पहले संबंधित पक्षों से जवाब और रिकॉर्ड मांगा है।
विवाद की शुरुआत कैसे हुई?
SIR से जुड़े चुनाव आयोग के फैसलों को लेकर विवाद उस समय बढ़ा जब एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि आयोग के भीतर दो चुनाव आयुक्तों ने कई फैसलों और प्रक्रियाओं पर आपत्ति दर्ज की थी। बाद में इन्हीं दावों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दाखिल की गईं।
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में SIR से जुड़े 14 मौकों पर दोनों अन्य चुनाव आयुक्तों की ओर से आपत्तियां दर्ज किए जाने का दावा किया गया था। इन दावों को याचिकाकर्ताओं ने भी अपनी दलीलों का आधार बनाया है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने अभी इन आरोपों को तथ्य के रूप में स्वीकार नहीं किया है और रिकॉर्ड मांगा है।
अब आगे क्या होगा?
अब चुनाव आयोग और अन्य प्रतिवादियों को चार सप्ताह में अपना जवाब देना होगा। इसके बाद अदालत संबंधित रिकॉर्ड की जांच करेगी और यह तय करेगी कि कथित फैसलों में आवश्यक संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया का पालन हुआ था या नहीं।
अगर रिकॉर्ड से यह साबित होता है कि किसी निर्णय को आयोग की आवश्यक प्रक्रिया के बिना लिया गया था, तो सुप्रीम कोर्ट उस निर्णय पर उचित आदेश देने पर विचार कर सकता है। फिलहाल CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ निलंबन का कोई अंतरिम आदेश नहीं है।
