रीवा जिले के सिरमौर क्षेत्र में प्रस्तावित टाटा न्यूक्लियर पावर प्लांट को लेकर ग्रामीणों का विरोध एक बार फिर तेज हो गया है। ग्राम पंचायत सरई कला में आयोजित ग्राम सभा में ग्रामीणों ने परियोजना के प्रस्ताव का विरोध करते हुए उसे सर्वसम्मति से खारिज करने का दावा किया है। ग्रामीणों का कहना है कि प्रस्तावित प्लांट को लेकर उनकी आपत्तियों और चिंताओं के बावजूद परियोजना से जुड़ी प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है।
ग्रामीणों ने इस दौरान “विनाश नहीं विकास चाहिए, न्यूक्लियर पावर प्लांट नहीं चाहिए” जैसे नारे लगाकर विरोध दर्ज कराया। उनका कहना है कि परियोजना से जमीन, पानी, पर्यावरण और स्थानीय आबादी पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव को लेकर उन्हें चिंता है।
सरई कला ग्राम सभा में न्यूक्लियर प्लांट के प्रस्ताव का विरोध
ग्रामीणों के अनुसार सरई कला ग्राम पंचायत में हुई ग्राम सभा में प्रस्तावित टाटा न्यूक्लियर पावर प्लांट के मुद्दे पर चर्चा की गई। ग्रामीणों ने परियोजना का विरोध करते हुए प्रस्ताव को सर्वसम्मति से खारिज करने की बात कही है। उनका कहना है कि ग्राम सभा की असहमति के बावजूद परियोजना से जुड़ी गतिविधियां आगे बढ़ने से लोगों में नाराजगी है।
ग्रामीणों ने सवाल उठाया कि जब स्थानीय स्तर पर ग्राम सभा में परियोजना को लेकर असहमति दर्ज की जा चुकी है, तो इसके बाद भी जमीन की जांच और अन्य प्रारंभिक गतिविधियां क्यों की जा रही हैं।
“न्यूक्लियर पावर प्लांट नहीं चाहिए”, ग्रामीणों ने लगाए नारे
ग्राम सभा और विरोध के दौरान ग्रामीणों ने प्रस्तावित परियोजना के खिलाफ नारे लगाए। ग्रामीणों का कहना है कि वे क्षेत्र में विकास के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन ऐसा विकास नहीं चाहते जिससे उनके सामने जमीन, पर्यावरण और भविष्य को लेकर खतरा पैदा हो।
ग्रामीणों ने “विनाश नहीं विकास चाहिए, न्यूक्लियर पावर प्लांट नहीं चाहिए” का नारा लगाकर अपनी आपत्ति दर्ज कराई।
रेडिएशन और न्यूक्लियर कचरे को लेकर ग्रामीणों की चिंता
प्रस्तावित परमाणु बिजली संयंत्र को लेकर स्थानीय ग्रामीणों में रेडिएशन और न्यूक्लियर कचरे से जुड़े संभावित प्रभावों को लेकर चिंता है। ग्रामीणों का दावा है कि किसी भी संभावित दुर्घटना या प्रदूषण की स्थिति में आसपास के क्षेत्रों पर लंबे समय तक असर पड़ सकता है।
ग्रामीणों ने अपने विरोध के दौरान रूस के चेर्नोबिल और जापान के फुकुशिमा परमाणु हादसों का भी उदाहरण दिया। उनका कहना है कि ऐसे हादसों से होने वाले संभावित नुकसान को देखते हुए परियोजना पर आगे बढ़ने से पहले स्थानीय लोगों की चिंताओं का समाधान किया जाना चाहिए।
इन आशंकाओं को ग्रामीणों की आपत्ति और चिंता के रूप में देखा जाना चाहिए। इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि प्रस्तावित रीवा परियोजना में ऐसी दुर्घटना होगी या उससे किसी विशेष बीमारी का निश्चित खतरा होगा। परियोजना के पर्यावरणीय और सुरक्षा प्रभावों का आकलन संबंधित विशेषज्ञ संस्थाओं और नियामक प्रक्रियाओं के तहत किया जाना होता है।
विस्थापन और जमीन को लेकर भी ग्रामीण चिंतित
ग्रामीणों का कहना है कि प्रस्तावित परियोजना से प्रभावित क्षेत्र में बड़ी संख्या में गरीब और वंचित परिवार रहते हैं। उनके मुताबिक, क्षेत्र में अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग की भी बड़ी आबादी है। ग्रामीणों को आशंका है कि परियोजना आगे बढ़ने पर जमीन अधिग्रहण और विस्थापन की स्थिति बन सकती है।
ग्रामीणों ने मांग की है कि जमीन, आबादी, पुनर्वास और रोजगार से जुड़े सभी सवालों पर स्पष्ट जानकारी सामने आने के बाद ही परियोजना से संबंधित आगे की प्रक्रिया की जाए।
रोझौही में बोरिंग मशीनों को भी ग्रामीणों ने लौटाया था
टाटा न्यूक्लियर पावर प्लांट को लेकर विरोध का यह मामला नया नहीं है। कुछ दिन पहले सिरमौर क्षेत्र के रोझौही गांव में परियोजना की प्रारंभिक जमीन जांच और बोरहोल के लिए दो बोरिंग मशीनें पहुंची थीं। ग्रामीणों के विरोध के बाद दोनों मशीनों को वापस लौटना पड़ा था।
ग्रामीणों के अनुसार, प्रस्तावित प्रारंभिक जांच में कुल 8 बोरहोल किए जाने थे। इनमें चार बोरहोल करीब 100 मीटर और चार करीब 50 मीटर गहराई के बताए गए थे। हालांकि, विरोध के कारण उस दिन काम आगे नहीं बढ़ सका।
करीब 100 गांवों के विरोध का दावा
स्थानीय ग्रामीणों का दावा है कि रोझौही और आसपास के करीब 100 गांवों में प्रस्तावित परियोजना को लेकर विरोध है। ग्रामीणों का कहना है कि जमीन, पानी और भविष्य से जुड़े सवालों को लेकर आसपास के गांवों के लोग भी अपनी आपत्तियां दर्ज करा रहे हैं।
इस दावे की व्यापकता और प्रत्येक गांव की स्थिति की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध जानकारी में नहीं है। इसलिए इसे ग्रामीणों के दावे के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
कलेक्टर के पत्र और ग्राम सभा की असहमति का मुद्दा
ग्रामीणों का कहना है कि कलेक्टर के पत्र क्रमांक 117 के संबंध में ग्राम सभा में पहले ही असहमति दर्ज की जा चुकी है। उनका दावा है कि ग्राम सभा के फैसले की लिखित सूचना सरपंच और सचिव की ओर से शासन-प्रशासन को भेजी गई है।
ग्रामीण इसी आधार पर सवाल उठा रहे हैं कि यदि स्थानीय ग्राम सभा ने परियोजना को लेकर असहमति दर्ज की है तो उसके बाद साइट से संबंधित जांच या अन्य गतिविधियां किस प्रक्रिया के तहत की जा रही हैं। इस संबंध में प्रशासन की ओर से विस्तृत आधिकारिक स्थिति सामने आना बाकी है।
सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी ने उठाए सवाल
सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी ने परियोजना को लेकर सरकार और कंपनी के रवैये पर सवाल उठाया। उनका कहना है कि जब ग्राम सभा ने प्रस्ताव को खारिज किया है और स्थानीय स्तर पर लगातार विरोध हो रहा है, तो परियोजना से जुड़ी गतिविधियां आगे बढ़ाने की कोशिश क्यों की जा रही है।
उन्होंने ग्रामीणों की आपत्तियों और ग्राम सभा के फैसले पर प्रशासन से स्थिति स्पष्ट करने की मांग की है।
टाटा पावर की रीवा परियोजना अभी किस चरण में है?
टाटा पावर की अपनी वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार कंपनी भारत में Small Modular Reactors सहित परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में प्रवेश की दिशा में काम कर रही है। कंपनी ने NPCIL के साथ सहयोग और संभावित साइटों पर तकनीकी अध्ययन की जानकारी दी है।
जुलाई 2026 की रिपोर्टों में भी टाटा पावर के मध्य प्रदेश समेत तीन राज्यों में परमाणु परियोजनाओं के लिए साइट स्टडी शुरू करने की जानकारी सामने आई थी। कंपनी ने संभावित साइटों के तकनीकी अध्ययन और आगे Detailed Project Report तैयार करने की प्रक्रिया की बात कही थी।
रिपोर्टों में रीवा में टाटा पावर की परियोजना को अभी Proposal Stage में बताया गया था और इसकी क्षमता अंतिम रूप से तय नहीं होने की जानकारी दी गई थी।
कंपनी और प्रशासन का पक्ष अभी महत्वपूर्ण
ग्राम सभा के विरोध और ग्रामीणों के आरोपों के बीच प्रशासन तथा संबंधित कंपनी का पक्ष महत्वपूर्ण है। उपलब्ध रिपोर्टों में ग्रामीणों के विरोध और ग्राम सभा की असहमति की जानकारी सामने आई है, लेकिन इस घटनाक्रम पर कंपनी या जिला प्रशासन की ओर से विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया उपलब्ध नहीं है।
इसलिए परियोजना की स्वीकृति, जमीन अधिग्रहण, ग्राम सभा की कानूनी स्थिति, साइट जांच की अनुमति और आगे की प्रक्रिया को लेकर अंतिम निष्कर्ष संबंधित सरकारी दस्तावेजों और आधिकारिक बयानों के आधार पर ही निकाला जाना चाहिए।
विरोध के बीच आगे क्या?
सरई कला में ग्राम सभा के विरोध और रोझौही में बोरिंग मशीनों को लौटाए जाने के बाद प्रस्तावित न्यूक्लियर पावर प्लांट को लेकर स्थानीय स्तर पर गतिरोध बढ़ता दिखाई दे रहा है। ग्रामीण अपनी जमीन, पानी, पर्यावरण और संभावित विस्थापन से जुड़े मुद्दों पर स्पष्ट जवाब चाहते हैं।
अब आगे की प्रक्रिया में प्रशासन और संबंधित कंपनी की ओर से ग्रामीणों की आपत्तियों पर क्या जवाब दिया जाता है और परियोजना से जुड़े तकनीकी तथा वैधानिक अध्ययन किस तरह आगे बढ़ते हैं, यह महत्वपूर्ण रहेगा।
