पितृ पक्ष 2026 में 1 अक्टूबर को षष्ठी श्राद्ध किया जाएगा। इस दिन उन पितरों का श्राद्ध करने की परंपरा है, जिनका निधन षष्ठी तिथि को हुआ हो। श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान, पंचबलि और ब्राह्मण भोजन जैसे कर्मों के लिए अपराह्न काल को महत्वपूर्ण माना जाता है।
1 अक्टूबर 2026 को कौन-सा श्राद्ध होगा?
पितृ पक्ष 2026 में 1 अक्टूबर को आश्विन कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि का श्राद्ध किया जाएगा। धार्मिक परंपरा के अनुसार जिस पितर का निधन षष्ठी तिथि को हुआ हो, उनका श्राद्ध पितृ पक्ष की षष्ठी तिथि पर किया जाता है।
1 अक्टूबर को पंचमी तिथि दोपहर से पहले तक रहने के बाद षष्ठी तिथि शुरू होती है। पंचांग गणना के अनुसार इस दिन षष्ठी श्राद्ध मनाया जाएगा।
1 अक्टूबर 2026 षष्ठी श्राद्ध का मुहूर्त
षष्ठी तिथि 1 अक्टूबर 2026 को लगभग दोपहर 12:35 बजे शुरू होकर 2 अक्टूबर की सुबह लगभग 10:15 बजे तक रहेगी। श्राद्ध कर्म के लिए कुतुप, रौहिण और अपराह्न काल को महत्वपूर्ण माना जाता है।
- कुतुप मुहूर्त: लगभग 11:18 AM से 12:06 PM
- रौहिण मुहूर्त: लगभग 12:06 PM से 12:53 PM
- अपराह्न काल: लगभग 12:53 PM से 3:16 PM
स्थानीय शहर के सूर्योदय और पंचांग के अनुसार समय में कुछ मिनट का अंतर हो सकता है।
षष्ठी श्राद्ध की पूजा सामग्री
- काला तिल
- जौ
- अक्षत
- कुश
- गंगाजल या शुद्ध जल
- सफेद फूल
- चावल
- दूध
- घी
- शहद
- मौसमी फल
- दीपक और धूप
- पितरों के लिए सात्विक भोजन
- ब्राह्मण भोजन और दान के लिए सामग्री
षष्ठी श्राद्ध की विधि
सुबह स्नान करके साफ कपड़े पहनें और पूजा स्थल को साफ करें। इसके बाद पितरों का स्मरण करते हुए श्राद्ध करने का संकल्प लें। पितर का नाम और गोत्र ज्ञात हो तो संकल्प में उसका उल्लेख किया जा सकता है।
दक्षिण दिशा की ओर मुख करके जल में काला तिल और कुश डालकर पितरों को तर्पण अर्पित करने की परंपरा है। इसके बाद परिवार की परंपरा के अनुसार पिंडदान किया जाता है।
श्राद्ध परंपरा में पंचबलि का भी महत्व माना जाता है। इसके बाद ब्राह्मण या जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन कराने और सामर्थ्य के अनुसार अन्न, वस्त्र या दक्षिणा देने की परंपरा है।
षष्ठी श्राद्ध के मंत्र
तर्पण के दौरान पितरों का स्मरण करते हुए सरल मंत्र का जाप किया जा सकता है:
ॐ पितृभ्यः स्वधा नमः।
पितर का नाम और गोत्र ज्ञात हो तो तर्पण करते समय उसका उल्लेख किया जा सकता है। विशेष वैदिक मंत्रों के लिए योग्य आचार्य या पुरोहित का मार्गदर्शन लिया जा सकता है।
श्राद्ध में क्या सावधानियां रखें?
- श्राद्ध कर्म निर्धारित समय में श्रद्धा के साथ करें।
- तर्पण और पिंडदान की विधि में जल्दबाजी न करें।
- भोजन सात्विक रखने की पारंपरिक मान्यता का पालन करें।
- शराब और मांसाहार से बचने की परंपरा कई परिवारों में है।
- भोजन की बर्बादी न करें।
- परिवार में विवाद और कटु व्यवहार से बचें।
- अनावश्यक दिखावे और खर्च से बचें।
- मृत्यु तिथि या गोत्र को लेकर भ्रम होने पर पुरोहित से सलाह लें।
अगर पितर की मृत्यु तिथि षष्ठी नहीं है
पितृ पक्ष में सामान्य धार्मिक परंपरा के अनुसार जिस तिथि को पितर का निधन हुआ था, उसी तिथि पर उनका श्राद्ध किया जाता है। इसलिए 1 अक्टूबर को केवल उन्हीं पितरों का षष्ठी श्राद्ध करना चाहिए जिनकी मृत्यु तिथि षष्ठी से संबंधित है।
जिन पितरों की मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है, उनके लिए परिवार की परंपरा के अनुसार सर्वपितृ अमावस्या पर श्राद्ध किया जा सकता है। 2026 में सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर को है।
1 अक्टूबर के बाद पितृ पक्ष की प्रमुख तिथियां
- 1 अक्टूबर: षष्ठी श्राद्ध
- 2 अक्टूबर: सप्तमी श्राद्ध
- 3 अक्टूबर: अष्टमी श्राद्ध
- 4 अक्टूबर: नवमी श्राद्ध
- 5 अक्टूबर: दशमी श्राद्ध
- 6 अक्टूबर: एकादशी श्राद्ध
- 7 अक्टूबर: द्वादशी श्राद्ध
- 8 अक्टूबर: त्रयोदशी श्राद्ध
- 9 अक्टूबर: चतुर्दशी श्राद्ध
- 10 अक्टूबर: सर्वपितृ अमावस्या
स्थानीय पंचांग से समय की पुष्टि जरूरी
श्राद्ध और तर्पण के समय की गणना स्थानीय सूर्योदय, तिथि और पंचांग के आधार पर की जाती है। इसलिए पिंडदान और श्राद्ध के लिए अपने शहर के स्थानीय पंचांग या पुरोहित से अंतिम मुहूर्त की पुष्टि करना उचित है।
