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सावन सोमवार स्पेशल: क्या केवल जल और बेलपत्र चढ़ाने से पूरी हो जाती है शिव पूजा, जानें भील शिकारी गुरुद्रुह की पौराणिक कथा

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सावन सोमवार पर केवल जल और बेलपत्र से प्रसन्न होते हैं भगवान शिव, जानें शिव पुराण में वर्णित शिकारी गुरुद्रुह की कथा।साभार: AI

मुख्य बिंदुQuick Read

  • केवल जल और बेलपत्र से प्रसन्न होते हैं भोलेनाथ: शिव पुराण के अनुसार यदि कोई विस्तृत पूजन सामग्री उपलब्ध न हो, तब भी केवल शुद्ध जल और बिल्वपत्र से शिव आराधना पूर्ण मानी जाती है।
  • सूत जी द्वारा वर्णित कथा: सूत जी ने ऋषियों को भील शिकारी 'गुरुद्रुह' की कथा सुनाई, जिसने अनजाने में चार प्रहर की पूजा कर शिव कृपा प्राप्त की थी।
  • चारों प्रहर की अनजाने में हुई पूजा: बेल के पेड़ पर बैठे शिकारी के हाथों से गिरे जल और बेलपत्र शिवलिंग पर गिरते गए और उसके संपूर्ण पाप नष्ट हो गए।
  • सप्तोपचार पूजन विधान: शिव पुराण में जलाभिषेक, गंध, फूल, बिल्वपत्र, धूप, दीप और नैवेद्य द्वारा विधिपूर्वक पूजा का भी शास्त्रीय उपाय बताया गया है।

TCE धर्म डेस्क। सावन मास में भगवान शिव की आराधना का विशेष महत्व है। कई बार भक्तों के मन में यह संशय उत्पन्न होता है कि यदि उनके पास पूजा की संपूर्ण सामग्री या विस्तृत अनुष्ठान के साधन उपलब्ध न हों, तो क्या केवल एक लोटा जल और बिल्वपत्र अर्पित करने से शिव पूजा पूर्ण हो जाती है? सनातन धर्म के प्रमुख ग्रंथ शिव पुराण के अनुसार, देवाधिदेव महादेव को 'आशुतोष' और 'भोलेनाथ' कहा गया है, जो किसी जटिल कर्मकांड या महंगे उपहारों के बजाय मात्र निष्कपट भाव, शुद्ध जल और बेलपत्र से ही परम संतुष्ट हो जाते हैं।

शिव पुराण में ऋषियों की शंका का समाधान करते हुए सूत जी ने भील शिकारी गुरुद्रुह की एक अत्यंत प्रेरक कथा सुनाई है, जो यह स्पष्ट करती है कि अनजाने में ही सही, यदि शिवलिंग पर मात्र जल और बेलपत्र अर्पित हो जाए तो भी महादेव अपने भक्त पर कृपा बरसा देते हैं।

यह भी पढ़ें: सावन सोमवार स्पेशल: शिवलिंग पर जल चढ़ाते समय किस दिशा में होना चाहिए मुख, जानें शिव पुराण का प्रामाणिक नियम, कथा

शिकारी गुरुद्रुह और बेल के पेड़ की पौराणिक कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, गुरुद्रुह नाम का एक भील शिकारी जंगल में रहता था और शिकार करके अपने परिवार का पालन-पोषण करता था। एक दिन उसे पूरे दिन जंगल में भटकने के बाद भी कोई शिकार नहीं मिला। घर में पत्नी और बच्चे भूखे थे, इसलिए वह शिकार की तलाश में शाम के समय एक जलाशय (तालाब) के किनारे पहुंचा। वहां उसने पानी पीने आने वाले पशुओं का शिकार करने की योजना बनाई और जलाशय किनारे स्थित एक बेल (बिल्व) के पेड़ पर चढ़कर बैठ गया। उसके पास थोड़ा सा पीने का पानी भी था। गुरुद्रुह को इस बात का तनिक भी ज्ञान नहीं था कि जिस बेल के पेड़ पर वह बैठा है, उसकी जड़ के पास एक प्राचीन शिवलिंग स्थापित है।

चारों प्रहर में अनजाने में हुई शिव आराधना

रात बीतने के साथ ही जंगल में अनूठा घटनाक्रम शुरू हुआ और चारों प्रहर में इस प्रकार पूजा संपन्न हुई:

  • प्रथम प्रहर की पूजा: रात के पहले प्रहर में एक हिरणी पानी पीने जलाशय पर आई। गुरुद्रुह ने उस पर तीर चलाने के लिए जैसे ही धनुष की प्रत्यंचा खींची, उसके हिलने-डुलने से पेड़ से जल की कुछ बूंदें और बेलपत्र टूटकर नीचे सीधे शिवलिंग पर जा गिरे। इस प्रकार अनजाने में उसके पहले प्रहर की शिव पूजा पूरी हो गई। जब हिरणी ने शिकारी को देखा तो उसने अपने बच्चों को परिवार को सौंपकर वापस लौटने का वचन दिया, जिस पर विश्वास कर शिकारी ने उसे जाने दिया।
  • दूसरे प्रहर की पूजा: रात्रि के दूसरे प्रहर में दूसरी हिरणी आई। गुरुद्रुह ने पुनः धनुष ताना और इस बार भी उसके पात्र से जल छलका और बेलपत्र शिवलिंग पर गिरे, जिससे दूसरे प्रहर की पूजा संपन्न हुई। उस हिरणी ने भी अपने दायित्व पूरे कर लौटने का वचन दिया और शिकारी ने उसे भी छोड़ दिया।
  • तीसरे प्रहर की पूजा: तीसरे प्रहर में एक मृग (हिरण) वहां आया। शिकारी ने पुनः निशाना साधा और पत्तों के हिलने से फिर से बिल्वपत्र और जल शिवलिंग पर अर्पित हुए, जिससे तीसरे प्रहर की विधिवत पूजा हो गई।
  • चौथे प्रहर में पापों का नाश: चौथे प्रहर में अपने वचनों के अनुसार सभी हिरण अपने पूरे परिवार के साथ शिकारी के सामने उपस्थित हो गए। गुरुद्रुह ने जैसे ही धनुष उठाया, पुनः जल और बेलपत्र शिवलिंग पर गिरे। चारों प्रहर की निरंतर पूजा के प्रभाव से गुरुद्रुह के जन्म-जन्मांतर के सभी संचित पाप नष्ट हो गए।

पशुओं की सत्यनिष्ठा और महादेव का साक्षात प्राकट्य

पशुओं की सत्यनिष्ठा, वचनबद्धता और समर्पण को देखकर क्रूर शिकारी का हृदय पूरी तरह पिघल गया। उसका मन करुणा से भर उठा और उसने अपने धनुष-बाण फेंककर शिकार का विचार सदा के लिए त्याग दिया। उसी क्षण भगवान शिव साक्षात प्रकट हुए और उन्होंने शिकारी की भक्ति और करुणा से प्रसन्न होकर उसे दर्शन दिए और मोक्ष का वरदान प्रदान किया।

शिव पुराण में वर्णित शिव पूजा के प्रामाणिक उपाय

शिव पुराण में स्पष्ट निर्देश दिया गया है कि यदि विस्तृत पूजन सामग्री का अभाव हो तो केवल जल और बिल्वपत्र से ही शिवजी की संपूर्ण आराधना की जा सकती है। वहीं, जब साधन उपलब्ध हों तो शिव पुराण में विधिपूर्वक पूजन के लिए निम्नलिखित सप्तोपचार क्रम का उल्लेख मिलता है:

  • जलाभिषेक: शुद्ध व शीतल जल से शिवलिंग को स्नान कराना।
  • गंध: चंदन या सुगंधित लेप अर्पित करना।
  • पुष्प: आक, धतूरा या श्वेत पुष्प चढ़ाना।
  • बिल्वपत्र: चिकनी सतह की ओर से तीन पत्तियों वाला अक्षत बेलपत्र अर्पित करना।
  • धूप: वातावरण की शुद्धि के लिए गुग्गल या चंदन की धूप देना।
  • दीप: गाय के घी का दीपक प्रज्वलित करना।
  • नैवेद्य: ऋतु फल, मिश्री या पंचामृत का भोग लगाना।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

1. क्या सिर्फ जल और बेलपत्र चढ़ाने से शिव पूजा पूरी मानी जाती है?

हां, शिव पुराण के अनुसार यदि पूजा की अन्य सामग्रियां उपलब्ध न हों, तब भी शुद्ध जल और बेलपत्र सच्ची श्रद्धा से चढ़ाने पर भगवान शिव की पूर्ण कृपा प्राप्त होती है।

2. भील शिकारी गुरुद्रुह की कथा से क्या सीख मिलती है?

यह कथा सिखाती है कि भगवान शिव बाह्य दिखावे के बजाय हृदय के भाव, सत्य और करुणा को महत्व देते हैं। अनजाने में भी किए गए शिव स्मरण का महान फल मिलता है।

3. शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाते समय किस बात का ध्यान रखना चाहिए?

बेलपत्र हमेशा तीन पत्तियों वाला, अखंडित (कटा-फटा न हो) और उसका चिकना भाग शिवलिंग की ओर करके अर्पित करना चाहिए।

4. शिव पुराण में विधिपूर्वक पूजा के कौन-से प्रमुख अंग बताए गए हैं?

शिव पुराण में जलाभिषेक, गंध (चंदन), पुष्प, बिल्वपत्र, धूप, दीप और नैवेद्य के माध्यम से शिवजी की सप्तोपचार पूजा का विधान बताया गया है।

संपादकीय लेखक एवं रिपोर्टर
सत्यापित रिपोर्टर
विशेष संवाददाता

मध्य प्रदेश, विंध्य, बुंदेलखंड और राष्ट्रीय घटनाक्रमों पर द सिटी एक्सप्रेस की विशेष रिपोर्टिंग टीम।

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