TCE नेशनल डेस्क। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर 20 जुलाई को CJP द्वारा आयोजित हुए 'संसद मार्च' और उसके बाद हुए भारी हंगामे को लेकर दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में अपना विस्तृत हलफनामा दाखिल किया है। पुलिस ने शीर्ष अदालत को बताया कि 20 जुलाई का संसद मार्च पूरी तरह से गैरकानूनी था और इसके लिए आयोजकों को कोई प्रशासनिक अनुमति नहीं दी गई थी। पुलिस के अनुसार, इस प्रदर्शन में बड़ी संख्या में असामाजिक तत्व और आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोग शामिल हो गए थे। डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस (DCP) सचिन शर्मा द्वारा दाखिल इस हलफनामे में पुलिस पर लगे अत्यधिक बल प्रयोग के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा गया है कि हिंसा रोकने और सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए कानूनी प्रक्रिया के तहत ही आवश्यक कदम उठाए गए थे।
प्रदर्शन में शामिल थे 2,873 हिस्ट्रीशीटर, SIT करेगी जांच
दिल्ली पुलिस ने हलफनामे में चौंकाने वाला खुलासा करते हुए बताया कि जंतर-मंतर पर हुए CJP के इस प्रदर्शन के दौरान कई गंभीर आपराधिक रिकॉर्ड वाले लोग मौजूद थे। पुलिस की प्राथमिक जांच और फेशियल रिकग्निशन डेटा के अनुसार, प्रदर्शनकारियों में लगभग 2,873 ऐसे लोग शामिल पाए गए हैं, जिन पर हत्या, हत्या के प्रयास, डकैती, बलात्कार और पॉक्सो (POCSO) जैसे संगीन अपराधों के मामले पहले से दर्ज हैं। इन मामलों की समग्र जांच के लिए एक विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया गया है जो पूरे घटनाक्रम की पड़ताल कर रहा है।
झड़प में 240 से ज्यादा पुलिसकर्मी और 200 प्रदर्शनकारी घायल
हलफनामे के अनुसार, 20 जुलाई को जंतर-मंतर और आसपास के करीब 3 किलोमीटर के दायरे में 30 हजार से अधिक प्रदर्शनकारी एकत्रित हो गए थे। इतनी विशाल भीड़ को नियंत्रित करने के लिए मौके पर लगभग 5 हजार पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई थी।
प्रदर्शनकारियों ने सुरक्षा घेरा तोड़ते हुए बैरिकेड्स को क्षतिग्रस्त किया और पुलिसकर्मियों पर सीधा हमला बोल दिया। इस हिंसक झड़प में 240 से अधिक पुलिसकर्मी और करीब 200 प्रदर्शनकारी घायल हुए। पुलिस ने स्पष्ट किया कि जब भीड़ हिंसक हो गई और सुरक्षा उपकरण छीने जाने लगे, तब व्यवस्था बहाल करने के लिए न्यूनतम बल प्रयोग करना अपरिहार्य हो गया था।
कील वाली लाठियों और सिविल ड्रेस के आरोपों पर जवाब
पुलिस ने याचिकाओं में लगाए गए विभिन्न आरोपों का बिंदुवार खंडन किया है:
- कील वाली लाठियों का आरोप: पुलिस ने कहा कि याचिकाओं में अधूरे वीडियो और चुनिंदा तस्वीरों के जरिए भ्रामक संदर्भ पेश किया गया है। जिस वीडियो में कील लगी लाठी दिखाई दे रही है, वह वास्तव में एक प्रदर्शनकारी के हाथ में थी, न कि किसी पुलिसकर्मी के पास।
- सिविल ड्रेस में पुलिस की तैनाती: स्पेशल ब्रांच, स्पेशल सेल, क्राइम ब्रांच और स्थानीय पुलिस के जवानों को सादे कपड़ों (सिविल ड्रेस) में भीड़ के बीच तैनात करना एक मानक सुरक्षा रणनीति (Standard Security Protocol) का हिस्सा है ताकि समय रहते असामाजिक तत्वों की गतिविधियों को भांपा जा सके।
- फेशियल रिकग्निशन का सीमित दायरा: पुलिस ने स्पष्ट किया कि फेशियल रिकग्निशन तकनीक का उपयोग किसी आम या शांतिपूर्ण नागरिक की प्रोफाइलिंग के लिए नहीं किया जाता। इसका इस्तेमाल केवल संगीन अपराधों में वांछित अपराधियों की पहचान और फील्ड वेरिफिकेशन के लिए किया जाता है।
प्रस्तावित जांच समिति के साथ पूर्ण सहयोग का आश्वासन
पुलिस कार्रवाई और कथित ज्यादती की कोर्ट की निगरानी में जांच की मांग वाली चार संबंधित याचिकाओं के जवाब में दिल्ली पुलिस ने साफ किया है कि यदि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में कोई स्वतंत्र जांच समिति गठित करता है, तो पुलिस उसके साथ पूरा सहयोग करेगी। उल्लेखनीय है कि कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का यह धरना जंतर-मंतर पर 20 जून से चल रहा था, जिसने 20 जुलाई को 'संसद चलो' आह्वान के बाद हिंसक रूप ले लिया था।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
1. सुप्रीम कोर्ट में 20 जुलाई के संसद मार्च पर दिल्ली पुलिस का मुख्य पक्ष क्या है?
दिल्ली पुलिस ने कहा कि यह मार्च बिना अनुमति के गैरकानूनी तरीके से आयोजित किया गया था और इसमें 2,800 से अधिक आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोग शामिल थे जिन्होंने पुलिस पर हमला किया।
2. इस झड़प में कुल कितने लोग घायल हुए थे?
हलफनामे के अनुसार, जंतर-मंतर पर हुई झड़प में 240 से अधिक पुलिसकर्मी और लगभग 200 प्रदर्शनकारी घायल हुए थे।
3. पुलिस ने कील वाली लाठियों के आरोपों पर क्या सफाई दी?
पुलिस ने स्पष्ट किया कि वीडियो में दिख रही कील वाली लाठी किसी पुलिसकर्मी के पास नहीं बल्कि एक प्रदर्शनकारी के हाथ में थी।
4. क्या दिल्ली पुलिस कोर्ट की निगरानी वाली जांच के लिए तैयार है?
हां, दिल्ली पुलिस ने हलफनामे में कहा है कि वह सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रस्तावित जांच समिति के साथ पूरी तरह सहयोग करने के लिए तैयार है।
