गणेशोत्सव का चौथा दिन 2026: आज 17 सितंबर 2026, गुरुवार को गणेशोत्सव का चौथा दिन है। देशभर में घरों और गणेश पंडालों में स्थापित गणपति की विशेष पूजा की जा रही है। 2026 में गणेश चतुर्थी 14 सितंबर को मनाई गई थी। इसके बाद 15 सितंबर को पंचमी, 16 सितंबर को षष्ठी और 17 सितंबर को सप्तमी तिथि पड़ रही है। इस तरह आज गणेश उत्सव का चौथा दिन है। एक प्रचलित धार्मिक परंपरा में चौथे दिन भगवान गणेश के एकदंत स्वरूप की पूजा का उल्लेख मिलता है। हालांकि अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में गणेशोत्सव के प्रत्येक दिन के स्वरूप को लेकर परंपराएं अलग हो सकती हैं।
चौथे दिन भगवान गणेश के किस स्वरूप की पूजा करें?
गणेशोत्सव के चौथे दिन एकदंत गणेश के स्वरूप की पूजा करने की परंपरा कुछ धार्मिक स्रोतों में बताई गई है। एकदंत का अर्थ है एक दांत वाले भगवान गणेश। इस स्वरूप में भगवान गणेश को बुद्धि, विवेक और विघ्नों को दूर करने वाले देवता के रूप में स्मरण किया जाता है।
चौथे दिन पूजा के लिए अलग से नई प्रतिमा स्थापित करना आवश्यक नहीं है। घर में स्थापित गणपति बप्पा की ही पूजा करते हुए उनका एकदंत स्वरूप ध्यान में रखा जा सकता है। मुख्य बात पूजा की श्रद्धा और अपने परिवार की परंपरा का पालन करना है।
17 सितंबर 2026 को कौन सी तिथि है?
17 सितंबर को सुबह करीब 10:48 बजे तक शुक्ल पक्ष षष्ठी रहेगी। इसके बाद शुक्ल पक्ष सप्तमी शुरू होगी, जो 18 सितंबर की दोपहर तक रहेगी। नई दिल्ली की पंचांग गणना में भी यही समय दिया गया है। उज्जैन की गणना में षष्ठी सुबह 10:48 बजे समाप्त होकर सप्तमी शुरू होने का समय दिया गया है।
आज अनुराधा नक्षत्र शाम करीब 7:54 बजे तक रहेगा, इसके बाद ज्येष्ठा नक्षत्र शुरू होगा। स्थानीय सूर्योदय और भौगोलिक स्थिति के अनुसार पंचांग के समय में कुछ मिनट का अंतर हो सकता है।
गणेश पूजा का शुभ मुहूर्त
गणेश पूजा के लिए किसी एक अनिवार्य मुहूर्त की आवश्यकता नहीं मानी जाती, खासकर जब गणपति की प्रतिमा पहले से स्थापित हो और प्रतिदिन पूजा की जा रही हो। फिर भी शुभ समय में पूजा करना चाहें तो 17 सितंबर को अभिजीत मुहूर्त करीब 11:51 AM से 12:39 PM तक है। यह समय नई दिल्ली की स्थानीय गणना पर आधारित है।
17 सितंबर को Rahu Kaal करीब 1:46 PM से 3:17 PM तक बताया गया है। इसलिए नई पूजा या किसी महत्वपूर्ण शुभ कार्य के लिए इस अवधि को छोड़कर समय चुनना पारंपरिक रूप से उचित माना जाता है। हालांकि नियमित गणेश पूजा अपने निर्धारित दैनिक समय पर भी की जा सकती है।
चौथे दिन गणेश पूजा की पूरी विधि
सबसे पहले सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें। पूजा स्थान की सफाई करें और गणपति की प्रतिमा के सामने दीपक जलाएं। यदि संभव हो तो पूजा की शुरुआत गणेशजी के एकदंत स्वरूप का ध्यान करके करें।
इसके बाद हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर पूजा का संकल्प लें। भगवान गणेश का आवाहन करें और उन्हें आसन अर्पित करें। फिर जल, पंचामृत या उपलब्ध सामग्री से प्रतीकात्मक स्नान कराया जा सकता है। यदि प्रतिमा को स्नान कराना संभव न हो तो जल अर्पित करके पूजा की जा सकती है।
गणेशजी को वस्त्र या मौली अर्पित करें। इसके बाद चंदन, रोली, अक्षत और पुष्प चढ़ाएं। दूर्वा अर्पित करें और भगवान को मोदक, लड्डू, फल या अन्य सात्त्विक नैवेद्य अर्पित करें। पूजा में लाल फूल चढ़ाने की भी परंपरा है।
एकदंत स्वरूप की पूजा में क्या चढ़ाएं?
- दूर्वा की गांठें
- लाल या अन्य ताजे पुष्प
- रोली और चंदन
- अक्षत
- धूप और दीप
- मोदक या लड्डू
- फल
- नारियल
- पान और सुपारी
- पंचामृत, यदि उपलब्ध हो
पूजा सामग्री की संख्या या प्रकार को लेकर अलग-अलग क्षेत्रीय परंपराएं हैं। घर में उपलब्ध सात्त्विक सामग्री से श्रद्धापूर्वक पूजा की जा सकती है।
गणेशजी का मुख्य मंत्र
गणेश पूजा में सबसे सरल और प्रचलित मंत्र है:
ॐ गं गणपतये नमः।
श्रद्धालु इस मंत्र का 11, 21, 51 या 108 बार जाप कर सकते हैं। संख्या से अधिक महत्वपूर्ण नियमितता और श्रद्धा मानी जाती है। गणेश पूजा में वक्रतुंड महाकाय मंत्र का पाठ भी किया जाता है।
वक्रतुंड महाकाय मंत्र
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
इसके बाद भगवान गणेश की स्तुति, गणेश अथर्वशीर्ष या अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार अन्य गणेश मंत्रों का पाठ किया जा सकता है।
गणेशजी को कौन सा भोग लगाएं?
गणेशजी की पूजा में मोदक को प्रमुख नैवेद्य माना जाता है। इसके अलावा बेसन के लड्डू, बूंदी के लड्डू, फल, नारियल, गुड़ और अन्य सात्त्विक मिठाई अर्पित की जा सकती है। कुछ क्षेत्रों में गणेशोत्सव के अलग-अलग दिनों में अलग-अलग पारंपरिक पकवानों का भोग लगाने की परंपरा भी है।
भोग लगाने के बाद कुछ समय के लिए उसे भगवान को समर्पित करें और फिर परिवार के सदस्यों में प्रसाद के रूप में बांटें।
गणेश पूजा में दूर्वा का महत्व
गणेश पूजा में दूर्वा अर्पित करने की विशेष परंपरा है। दूर्वा को साफ करके उसकी छोटी-छोटी गांठें बनाकर गणेशजी को अर्पित किया जाता है। दूर्वा अर्पित करते समय ॐ गं गणपतये नमः का जाप किया जा सकता है।
दूर्वा अर्पित करते समय गणेशजी के मस्तक और शरीर पर इसे रखने की स्थानीय परंपरा हो सकती है। पूजा में दूर्वा का प्रयोग परिवार और क्षेत्र की धार्मिक परंपरा के अनुसार किया जाता है।
गणेशजी की पूजा में क्या नहीं करना चाहिए?
पूजा स्थल को साफ रखना चाहिए और भगवान को अर्पित की जाने वाली सामग्री स्वच्छ होनी चाहिए। नैवेद्य सात्त्विक रखना चाहिए। पूजा के दौरान जल्दबाजी के बजाय शांत मन से मंत्र, स्तुति और आरती करना उचित है।
यदि घर में पहले से गणेश प्रतिमा स्थापित है तो प्रतिदिन की पूजा उसी प्रतिमा के सामने की जा सकती है। अलग-अलग दिन अलग स्वरूप का ध्यान करना अनिवार्य नियम नहीं है; यह क्षेत्रीय और पारिवारिक परंपरा के अनुसार बदल सकता है।
गणेशजी की आरती
पूजा और मंत्र जाप के बाद भगवान गणेश की आरती की जाती है। घरों में सबसे अधिक प्रचलित आरतियों में जय गणेश देवा आरती शामिल है:
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥एकदंत दयावंत, चार भुजाधारी।
माथे सिंदूर सोहे, मूसे की सवारी॥पान चढ़े, फूल चढ़े और चढ़े मेवा।
लड्डुअन का भोग लगे, संत करें सेवा॥अंधन को आंख देत, कोढ़िन को काया।
बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया॥सूर श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
आरती के बाद भगवान गणेश को पुष्पांजलि अर्पित करें और परिवार के सभी सदस्य प्रसाद ग्रहण करें। पारिवारिक परंपरा के अनुसार गणेश अथर्वशीर्ष या अन्य स्तोत्र का पाठ भी किया जा सकता है। गणेश पूजा की विस्तृत विधि में आवाहन, पाद्य, अर्घ्य, पुष्पांजलि, प्रदक्षिणा और नीराजन जैसे चरण भी बताए गए हैं।
क्या चौथे दिन विसर्जन किया जा सकता है?
गणेश प्रतिमा का विसर्जन केवल अनंत चतुर्दशी पर ही करना आवश्यक नहीं है। कई परिवार अपनी परंपरा के अनुसार डेढ़ दिन, तीसरे, पांचवें, सातवें या अन्य निर्धारित दिन विसर्जन करते हैं। 2026 में अनंत चतुर्दशी 25 सितंबर को है, जिस दिन गणेशोत्सव का प्रमुख विसर्जन होता है।
इसलिए यदि किसी परिवार ने गणपति को पूरे दस दिन रखने का संकल्प लिया है तो चौथे दिन केवल नियमित पूजा की जाएगी। वहीं जिन परिवारों की अपनी अलग विसर्जन परंपरा है, वे उसी के अनुसार आगे की पूजा और विसर्जन कर सकते हैं।
गणेशोत्सव के चौथे दिन का धार्मिक महत्व
गणेशोत्सव के दौरान प्रतिदिन भगवान गणेश की पूजा, आरती, मंत्र जाप और नैवेद्य अर्पण किया जाता है। चौथे दिन एकदंत स्वरूप का ध्यान करने की परंपरा भगवान गणेश के विशिष्ट स्वरूप और उनके प्रतीकात्मक महत्व से जुड़ी है। हालांकि दिन-विशेष स्वरूपों की सूची सभी संप्रदायों और क्षेत्रों में समान नहीं है। इसलिए श्रद्धालु अपने कुलाचार और स्थानीय परंपरा के अनुसार भी पूजा कर सकते हैं।
2026 में 17 सितंबर को गणेशोत्सव का चौथा दिन होने के साथ शुक्ल पक्ष सप्तमी भी रहेगी। दिन के शुभ समय में पूजा, मंत्र जाप, भोग और आरती करके परिवार के साथ गणपति बप्पा का आशीर्वाद लिया जा सकता है।