रीवा के संजय गांधी स्मृति चिकित्सालय में कल्पना मिश्रा और उनके नवजात बच्चे की मौत का मामला 16 सितंबर 2026 को एक और मोड़ पर पहुंच गया। बेटी को न्याय दिलाने की मांग को लेकर करीब दो सप्ताह से आमरण अनशन कर रहे कल्पना के पिता रामशिरोमणि मिश्रा की तबीयत लगातार बिगड़ने के बाद प्रशासन ने उन्हें धरना स्थल से हटाकर अस्पताल में भर्ती कराया। प्रशासन के मुताबिक डॉक्टरों की सलाह पर उनकी हालत को देखते हुए अस्पताल में शिफ्ट किया गया है। वहीं, परिवार अब भी जिम्मेदार लोगों के खिलाफ FIR दर्ज करने की मांग पर कायम है।
पिता को हटाए जाने के दौरान सिरमौर चौराहे पर पुलिस बल तैनात रहा। प्रशासन ने कहा कि धरना सड़क पर हो रहा था और वहां प्रदर्शन की अनुमति नहीं थी। तहसीलदार शिवशंकर शुक्ला के मुताबिक पिता की सेहत लगातार गिर रही थी, इसलिए चिकित्सकीय सलाह के बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया। प्रशासन ने बल प्रयोग से इनकार किया है।
25 अगस्त को अस्पताल पहुंची थीं कल्पना
मामले की शुरुआत 25 अगस्त 2026 को हुई, जब रीवा जिले के हटवा गांव की रहने वाली कल्पना मिश्रा प्रसव के लिए संजय गांधी स्मृति चिकित्सालय पहुंचीं। उपलब्ध रिपोर्टों में उनके अस्पताल पहुंचने की तारीख और अगले दिन हुई मौत की पुष्टि होती है। अस्पताल में प्रसव के दौरान उनकी हालत बिगड़ी और 26 अगस्त को कल्पना तथा उनके नवजात बच्चे दोनों की मौत हो गई।
परिवार ने इसके बाद इलाज में कथित लापरवाही के आरोप लगाए। परिजनों का कहना है कि अस्पताल में इलाज और निगरानी को लेकर उन्होंने डॉक्टरों और स्टाफ से शिकायत की थी। परिवार ने कुछ स्वास्थ्यकर्मियों पर गंभीर आरोप भी लगाए, जिनकी पुष्टि जांच के बाद ही हो सकती है।
मौत से पहले का वीडियो सामने आया
मामले में कल्पना का एक वीडियो भी सामने आया, जिसे बाद में सोशल मीडिया और मीडिया रिपोर्टों में व्यापक रूप से प्रसारित किया गया। वीडियो में कल्पना परेशान दिखाई देती हैं और परिजनों से मदद मांगती नजर आती हैं। परिवार ने इस वीडियो को अस्पताल में उनके साथ हुई कथित लापरवाही के संदर्भ में पेश किया। हालांकि, केवल वीडियो के आधार पर मौत के कारण या किसी व्यक्ति की आपराधिक जिम्मेदारी तय नहीं की जा सकती।
परिवार ने डॉक्टरों पर लगाए गंभीर आरोप
कल्पना के पिता और अन्य परिजनों ने इलाज के दौरान लापरवाही का आरोप लगाया। परिवार की ओर से अस्पताल में पैसों की मांग किए जाने का आरोप भी लगाया गया है। अलग-अलग मीडिया रिपोर्टों में यह रकम 30 हजार रुपये बताई गई है। यह परिवार का आरोप है और इसकी स्वतंत्र पुष्टि जांच के जरिए होनी बाकी है।
परिवार का कहना है कि केवल विभागीय निलंबन या प्रशासनिक कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। उनकी मांग है कि इलाज से जुड़े सभी जिम्मेदार डॉक्टरों, कर्मचारियों और अधिकारियों की भूमिका की जांच कर FIR दर्ज की जाए।
28 अगस्त को चार स्वास्थ्यकर्मियों पर कार्रवाई
घटना के बाद अस्पताल स्तर पर कार्रवाई शुरू हुई। रिपोर्टों के अनुसार ड्यूटी डॉक्टर डॉ. सोनल अग्रवाल, एनेस्थीसिया विभाग की डॉ. निधि पांडे और दो Nursing Officers को निलंबित किया गया। इस तरह शुरुआती कार्रवाई में चार स्वास्थ्यकर्मी जांच के दायरे में आए।
इसके बाद अस्पताल के तत्कालीन अधीक्षक डॉ. राहुल मिश्रा को पद से हटा दिया गया। उनकी जगह डॉ. प्रियंक शर्मा को अस्पताल की जिम्मेदारी दी गई। अधीक्षक के खिलाफ कार्रवाई के बीच परिवार की ओर से उनके व्यवहार और इलाज से जुड़े कई आरोप भी लगाए गए, जिन्हें जांच के संदर्भ में देखा जा रहा है।
मेडिकल कॉलेज के Dean का भी तबादला
मामले में प्रशासनिक कार्रवाई का दायरा बाद में मेडिकल कॉलेज के स्तर तक पहुंचा। 6 सितंबर को श्याम शाह मेडिकल कॉलेज, रीवा के Dean डॉ. सुनील कुमार अग्रवाल का तबादला सतना मेडिकल कॉलेज कर दिया गया। उनकी जगह सतना मेडिकल कॉलेज के Dean डॉ. शशिधर प्रसाद गर्ग को रीवा की जिम्मेदारी दी गई। सरकारी आदेश में तबादले का कारण स्पष्ट नहीं बताया गया है, इसलिए इसे अपने आप में किसी व्यक्ति की दोषसिद्धि नहीं माना जा सकता।
सितंबर की शुरुआत में पिता ने शुरू किया आमरण अनशन
प्रशासनिक कार्रवाई के बावजूद परिवार की FIR की मांग पूरी नहीं हुई तो कल्पना के पिता रामशिरोमणि मिश्रा ने सिरमौर चौराहे पर आमरण अनशन शुरू कर दिया। 2 सितंबर को उनके धरने की शुरुआत और FIR दर्ज होने तक आंदोलन जारी रखने की बात सामने आई थी।
अनशन के शुरुआती दिनों में ही पिता की हालत बिगड़ने लगी। लगातार भोजन नहीं लेने के कारण उन्हें बैठने में भी परेशानी होने लगी और वे काफी समय धरना स्थल पर लेटे रहते थे। इसके बावजूद उन्होंने FIR दर्ज होने तक अनशन खत्म नहीं करने की बात कही।
डिप्टी CM धरना स्थल पहुंचे, लेकिन नहीं टूटा अनशन
मामले के बढ़ने के बाद उप मुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल भी धरना स्थल पहुंचे और रामशिरोमणि मिश्रा से मुलाकात की। उन्होंने परिवार को निष्पक्ष जांच और कार्रवाई का भरोसा दिया। बाद में प्रशासन ने मामले की मजिस्ट्रियल जांच की प्रक्रिया शुरू की।
इसके बावजूद पिता ने अनशन खत्म नहीं किया। उनका कहना रहा कि प्रशासनिक कार्रवाई अपनी जगह है, लेकिन जिम्मेदार लोगों के खिलाफ FIR दर्ज होने तक आंदोलन जारी रहेगा।
मजिस्ट्रियल जांच में सात बिंदुओं पर पड़ताल
कलेक्टर एवं जिला दंडाधिकारी नरेंद्र कुमार सूर्यवंशी ने कल्पना और उनके नवजात बच्चे की मौत की मजिस्ट्रियल जांच के आदेश दिए। जांच की जिम्मेदारी सिरमौर की SDM दृष्टि जायसवाल को दी गई। प्रशासन ने जांच के लिए सात बिंदु तय किए हैं और एक महीने में रिपोर्ट देने का लक्ष्य रखा है।
जांच के दौरान इलाज की परिस्थितियों, अस्पताल में उपलब्ध रिकॉर्ड, संबंधित डॉक्टरों और स्टाफ की भूमिका तथा परिवार की ओर से लगाए गए आरोपों की पड़ताल की जा रही है। प्रशासन ने लोगों और प्रत्यक्षदर्शियों से भी साक्ष्य और लिखित बयान देने की अपील की है।
Postmortem में भी मौत की अंतिम वजह साफ नहीं
कल्पना और उनके नवजात बच्चे के Postmortem के बाद भी मौत का अंतिम कारण तत्काल तय नहीं हुआ। कल्पना की रिपोर्ट में मौत का कारण निर्धारित नहीं किया गया और Histopathology तथा इलाज से जुड़े पूरे रिकॉर्ड मिलने के बाद अंतिम राय देने की बात कही गई। नवजात की रिपोर्ट में भी मौत का कारण सुरक्षित रखा गया।
Postmortem रिपोर्ट में एक महत्वपूर्ण बात यह भी दर्ज होने की रिपोर्ट है कि अस्पताल का उपचार संबंधी रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं कराया गया था। ऐसे में भर्ती होने से लेकर ऑपरेशन, उपचार, दवाओं, निगरानी और मौत तक की पूरी Medical Timeline जांच के लिए महत्वपूर्ण हो जाती है। Postmortem रिपोर्ट अपने आप में इलाज में लापरवाही साबित नहीं करती; अंतिम चिकित्सकीय निष्कर्ष के लिए Histopathology और पूरे उपचार रिकॉर्ड की जरूरत बताई गई है।
FIR को लेकर क्यों अटका है मामला?
परिवार लगातार FIR की मांग कर रहा है। दूसरी ओर प्रशासन की ओर से परिजनों को बताया गया कि Medical Negligence के आरोप में सीधे FIR दर्ज करने से पहले चिकित्सकीय विशेषज्ञ की राय और जांच प्रक्रिया जरूरी है। इसी वजह से परिवार को मजिस्ट्रियल जांच तथा विशेषज्ञ जांच पूरी होने के बाद आगे की कार्रवाई की बात बताई गई।
यही इस पूरे विवाद का सबसे अहम बिंदु है। परिवार का कहना है कि विभागीय कार्रवाई के बावजूद आपराधिक मामला दर्ज नहीं हुआ है, जबकि प्रशासन का कहना है कि जांच के निष्कर्षों के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी। इसलिए अभी किसी डॉक्टर या अधिकारी को कल्पना की मौत के लिए आपराधिक रूप से जिम्मेदार ठहराना जांच पूरी होने से पहले उचित नहीं होगा।
15वें दिन क्या हुआ?
15 सितंबर तक पिता का आमरण अनशन 14वें दिन में पहुंच चुका था। उस समय उनकी शारीरिक स्थिति काफी कमजोर बताई गई थी और वे ज्यादातर समय लेटे रहते थे। उन्होंने फिर दोहराया कि FIR के बिना आंदोलन खत्म नहीं करेंगे।
16 सितंबर को अनशन का 15वां दिन पूरा होने से पहले प्रशासन ने उन्हें धरना स्थल से हटा दिया। इस दौरान पुलिस बल मौजूद रहा और अन्य आंदोलनकारियों को भी वहां से हटाया गया। प्रशासन के अनुसार पिता की लगातार बिगड़ती सेहत को देखते हुए डॉक्टरों की सलाह पर उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया है। तहसीलदार ने बल प्रयोग से इनकार किया।
अब आगे क्या होगा?
मामले में तीन प्रक्रियाएं समानांतर रूप से महत्वपूर्ण हैं। पहली, कल्पना और नवजात की मौत की चिकित्सकीय वजह स्पष्ट करने वाली जांच और Histopathology रिपोर्ट। दूसरी, मजिस्ट्रियल जांच, जिसमें इलाज और अस्पताल की व्यवस्थाओं से जुड़े सात बिंदुओं पर रिपोर्ट तैयार की जा रही है। तीसरी, यदि जांच में आपराधिक लापरवाही या अन्य संज्ञेय अपराध के पर्याप्त आधार सामने आते हैं, तो FIR और उसके बाद की कानूनी प्रक्रिया।
इस बीच अस्पताल के चार स्वास्थ्यकर्मियों के निलंबन, अधीक्षक को हटाने और Dean के तबादले जैसी प्रशासनिक कार्रवाई हो चुकी है। लेकिन इन कार्रवाइयों को किसी व्यक्ति की अंतिम आपराधिक जिम्मेदारी या दोषसिद्धि नहीं माना जा सकता। इसका फैसला जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया से ही होगा।
फिलहाल कल्पना मिश्रा के पिता अस्पताल में हैं और परिवार की FIR की मांग कायम है। दूसरी ओर प्रशासनिक और चिकित्सकीय जांच आगे बढ़ रही है। अब इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज जांच रिपोर्ट, अस्पताल के उपचार रिकॉर्ड और Postmortem से जुड़ी लंबित चिकित्सकीय राय होंगे, जिनसे यह स्पष्ट हो सकेगा कि 26 अगस्त को कल्पना और उनके नवजात की मौत किन परिस्थितियों में हुई।