नाना पाटेकर का नाम आते ही सबसे पहले ‘परिंदा’, ‘क्रांतिवीर’, ‘प्रहार’, ‘अग्निसाक्षी’ और ‘वेलकम’ जैसी फिल्मों के किरदार याद आते हैं। लेकिन 8 अक्टूबर 2026 को उनके निधन के बाद उनकी जिंदगी के उस पक्ष को भी याद किया जा रहा है, जो कैमरे और फिल्मों से दूर था। नाना पाटेकर ने महाराष्ट्र के किसानों और ग्रामीण परिवारों के लिए लंबे समय तक सामाजिक काम किया।
उनका यह काम सिर्फ किसी एक बार की आर्थिक मदद तक सीमित नहीं रहा। किसान परिवारों की परेशानी से शुरू हुई पहल आगे चलकर पानी संरक्षण, विधवा कल्याण, शिक्षा, रोजगार और गांवों के विकास से जुड़ी। इस काम के लिए उन्होंने अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ सितंबर 2015 में NAAM Foundation की शुरुआत की थी।
किसानों की परेशानी देखकर शुरू किया था काम
NAAM Foundation के अनुसार, 2015 के महाराष्ट्र के गंभीर सूखे और किसान परिवारों की स्थिति ने नाना पाटेकर और मकरंद अनासपुरे को इस दिशा में काम करने के लिए प्रेरित किया। शुरुआत में किसान आत्महत्या से प्रभावित परिवारों और विधवाओं को तत्काल आर्थिक सहायता पहुंचाई गई। बाद में संस्था ने इस समस्या के मूल कारणों पर काम करने की दिशा में कदम बढ़ाया।
NAAM Foundation का कहना है कि केवल आर्थिक सहायता स्थायी समाधान नहीं है। पानी की कमी, सिंचाई की समस्या, जल स्रोतों की खराब स्थिति और ग्रामीण रोजगार जैसे मुद्दों पर काम करना जरूरी है। इसी सोच के साथ संस्था ने अपने काम का दायरा बढ़ाया।
किसान आत्महत्या से प्रभावित परिवारों को मदद
NAAM Foundation की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, संस्था ने महाराष्ट्र में किसान आत्महत्या से प्रभावित 4,940 परिवारों को आर्थिक सहायता दी है। संस्था के अनुसार शुरुआत में किसान की आत्महत्या के बाद परिवार की महिलाओं को तत्काल राहत देने के लिए ₹15,000 की सहायता दी जाती थी, जिसे बाद में ₹25,000 किया गया।
NAAM का कहना है कि यह सहायता केवल आर्थिक राहत के तौर पर नहीं, बल्कि मुश्किल समय से गुजर रहे परिवारों को सामाजिक और भावनात्मक सहारा देने के उद्देश्य से भी दी गई।
विधवाओं के लिए रोजगार और आत्मनिर्भरता पर जोर
किसान की मौत के बाद परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी अक्सर उसकी पत्नी पर आ जाती है। NAAM Foundation ने ऐसी महिलाओं के लिए आय के साधन विकसित करने से जुड़े कार्यक्रम भी चलाए। संस्था की वेबसाइट पर income-generating skills और animal husbandry जैसे कार्यक्रमों का उल्लेख है।
संस्था के अनुसार उसके विधवा कल्याण कार्यक्रम से अब तक 2,715 लोगों के जीवन पर असर पड़ा है। इसका उद्देश्य केवल तत्काल आर्थिक सहायता देना नहीं, बल्कि परिवारों को दोबारा अपने पैरों पर खड़ा होने में मदद करना रहा है।
पानी बचाने के काम को बनाया बड़ा अभियान
नाना पाटेकर के सामाजिक काम का सबसे बड़ा हिस्सा महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों में पानी संरक्षण से जुड़ा रहा। NAAM Foundation ने सूखा प्रभावित क्षेत्रों में नदियों, नालों और जल स्रोतों के पुनर्जीवन पर काम किया।
NAAM Foundation के मौजूदा आंकड़ों के मुताबिक उसके जल संरक्षण प्रोजेक्ट 2,187 गांवों तक पहुंचे हैं और इससे करीब 1.27 करोड़ लोगों को लाभ मिलने का दावा संस्था करती है। संस्था ने 198 नदियों के पुनर्जीवन, हजारों जल स्रोतों की सफाई और नाला गहरीकरण जैसे काम भी दर्ज किए हैं।
‘नाम’ सिर्फ राहत नहीं, गांवों के विकास की कोशिश
समय के साथ NAAM Foundation का काम किसान परिवारों को आर्थिक सहायता देने से आगे बढ़ा। संस्था ने ग्रामीण इलाकों में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, जल संरक्षण और आजीविका से जुड़े कार्यक्रम शुरू किए। उसके वार्षिक रिपोर्ट में भी पानी की उपलब्धता और ग्रामीण समुदायों को आत्मनिर्भर बनाने को प्रमुख क्षेत्रों में रखा गया है।
इस मॉडल का उद्देश्य यह था कि किसी संकट के बाद केवल आर्थिक मदद देने के बजाय गांवों में ऐसी व्यवस्थाएं तैयार की जाएं, जिनसे लोगों को लंबे समय तक फायदा मिल सके।
नाना पाटेकर की निजी मदद भी चर्चा में रही
NAAM Foundation शुरू होने से पहले भी नाना पाटेकर के सामाजिक योगदान के कई उदाहरण सामने आए थे। उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार उन्होंने महाराष्ट्र में सूखा राहत के लिए अपने एक पुरस्कार की राशि दान की थी और फिल्म ‘पाठशाला’ से मिली अपनी फीस को भी अलग-अलग चैरिटी संस्थाओं को देने की जानकारी सामने आई थी।
2015 में उन्होंने विदर्भ और मराठवाड़ा के किसान आत्महत्या से प्रभावित परिवारों को व्यक्तिगत स्तर पर आर्थिक मदद भी दी थी। बाद में इसी तरह के प्रयास को व्यापक रूप देने के लिए NAAM Foundation की स्थापना हुई।
सिर्फ अभिनेता नहीं, जमीन से जुड़े इंसान की छवि
नाना पाटेकर की सार्वजनिक छवि हमेशा अपेक्षाकृत सादगीपूर्ण रही। फिल्मों में करोड़ों दर्शकों के सामने नजर आने वाले इस अभिनेता का ग्रामीण जीवन और खेती से भी गहरा जुड़ाव रहा। यही वजह है कि किसानों और ग्रामीण परिवारों से जुड़े उनके काम को उनके प्रशंसक उनके फिल्मी करियर से अलग एक महत्वपूर्ण विरासत के रूप में देखते हैं।
8 अक्टूबर को हुआ नाना पाटेकर का निधन
नाना पाटेकर का 8 अक्टूबर 2026 को 75 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उनके बेटे मल्हार पाटेकर ने निधन की पुष्टि की। उपलब्ध जानकारी के अनुसार गोवा स्थित उनके घर पर उन्हें बेहोशी की हालत में पाया गया, जिसके बाद अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित किया। रिपोर्टों के मुताबिक कार्डियक अरेस्ट के बाद उन्हें करीब 45 मिनट तक CPR दी गई।
उनके निधन से भारतीय सिनेमा ने एक अलग अंदाज वाले अभिनेता को खो दिया है। लेकिन उनकी विरासत केवल फिल्मों और पुरस्कारों तक सीमित नहीं है। किसानों, उनकी विधवाओं और सूखा प्रभावित गांवों के लिए शुरू किया गया सामाजिक काम भी नाना पाटेकर की सार्वजनिक जिंदगी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहेगा।
नाना पाटेकर की विरासत में ‘नाम’ का भी हिस्सा
नाना पाटेकर को आने वाली पीढ़ियां उनके किरदारों और संवादों के लिए याद करेंगी, लेकिन NAAM Foundation के जरिए किया गया काम उनकी दूसरी पहचान को सामने लाता है। जिस पहल की शुरुआत किसान परिवारों को तत्काल सहारा देने से हुई थी, वह आगे चलकर पानी संरक्षण और ग्रामीण विकास के बड़े प्रयास में बदल गई।
उनके निधन के बाद उनकी इस सामाजिक यात्रा को याद करना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दिखाती है कि एक कलाकार की सार्वजनिक पहचान उसके पर्दे पर निभाए किरदारों से कहीं आगे भी हो सकती है।
