✍️ विशेष संवाददाता•Published On 19th Aug, 2026 @ 2:59 AM
Updated On 19th Aug, 2026 @ 3:03 AM
18 साल की उम्र में इंजीनियरिंग छोड़ एस्ट्रोनॉमी का रुख करने वाले भारतीय खगोलशास्त्री डॉ. रोहन पी. नायडू के नेतृत्व में जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप (JWST) ने खोजा बिग बैंग के 660 मिलियन वर्ष बाद का एक अनोखा गैस-आच्छादित ब्लैक होल।
TCE साइंस डेस्क। ब्रह्मांड के जन्म (बिग बैंग) के शुरुआती दौर को समझने की दिशा में भारतीय मूल के युवा खगोलशास्त्री डॉ. रोहन पी. नायडू (Rohan P. Naidu) ने एक युगांतरकारी खोज की है। 18 वर्ष की आयु में इंजीनियरिंग की पारंपरिक पढ़ाई छोड़कर एस्ट्रोफिजिक्स का रुख करने वाले हैदराबाद में जन्मे रोहन नायडू के नेतृत्व में वैज्ञानिकों की एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप (NASA James Webb Space Telescope - JWST) की मदद से ब्रह्मांड के सबसे शुरुआती दौर का एक अत्यंत दुर्लभ 'ब्लैक होल स्टार' खोज निकाला है। प्रतिष्ठित विज्ञान पत्रिका 'नेचर' (Nature) में 12 अगस्त 2026 को प्रकाशित इस शोध के सामने आने के बाद से रोहन नायडू और उनकी रिसर्च 'MoM-BH-1*' दुनिया भर में सबसे बड़े ट्रेंडिंग टॉपिक्स में शुमार हो गई है।
हैदराबाद की गलियों से एमआईटी के रिसर्च लैब तक का असाधारण सफर
डॉ. रोहन नायडू का खगोल भौतिकी तक पहुंचने का रास्ता किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। हैदराबाद में पले-बढ़े रोहन ने स्कूली शिक्षा के बाद सामान्य भारतीय छात्रों की तरह इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला लिया था। हालांकि, महज 18 साल की उम्र में उन्होंने लीक से हटकर एक बड़ा और साहसिक फैसला लिया। उन्होंने इंजीनियरिंग कॉलेज को बीच में ही छोड़ने (ड्रॉपआउट करने) का निर्णय लिया और अपनी जिंदगी का पहला हवाई टिकट खरीदकर सिंगापुर के येल-एनयूएस कॉलेज (Yale-NUS College) के 150 छात्रों के शुरुआती बैच में शामिल हो गए।
अंडरग्रेजुएट स्तर पर ब्लेजर्स (Blazars) पर रिसर्च करते हुए उनका रुझान खगोल विज्ञान और सुदूर ब्रह्मांड की ओर गहरा होता गया। इसके बाद उन्होंने विश्व प्रसिद्ध हार्वर्ड यूनिवर्सिटी (Harvard University) से जाने-माने खगोलशास्त्री चार्ली कॉनरॉय के मार्गदर्शन में अपनी पीएचडी (PhD) पूरी की। पीएचडी के दौरान उन्होंने हमारी आकाशगंगा (Milky Way) के सुदूर कोनों और उसमें विलीन हो चुकी प्राचीन आकाशगंगाओं के अवशेषों का अध्ययन किया। वर्तमान में वे मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) में फिजिक्स के प्रतिष्ठित 'पापलार्डो फेलो' (Pappalardo Fellow) हैं। खगोलशास्त्र की जटिल गणनाओं के अलावा रोहन नायडू एक प्रकाशित कवि, क्विज-ट्रिविया के शौकीन और टेस्ट क्रिकेट के जबर्दस्त प्रशंसक हैं।
JWST ने पकड़ी असामान्य लाल रोशनी: क्या है 'MoM-BH-1*'?
नेचर जर्नल में ‘A gas-enshrouded and gas-reddened black hole at cosmic dawn’ शीर्षक से प्रकाशित अध्ययन का मुख्य केंद्र 'MoM-BH-1*' नामक एक अत्यधिक चमकीला और गहरे लाल रंग का खगोलीय स्रोत है। इस ऑब्जेक्ट को नासा के जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप के 'मिराज या मिरेकल' (Mirage/Miracle) प्रोग्राम के तहत खोजा गया था।
यह खगोलीय पिंड उस दौर का है जब हमारा ब्रह्मांड अपनी कुल आयु का मात्र 5 प्रतिशत यानी केवल 660 मिलियन (66 करोड़) वर्ष पुराना था। खगोल विज्ञान में इस कालखंड को 'कॉस्मिक डॉन' (Cosmic Dawn) कहा जाता है, जब ब्रह्मांड के पहले तारे, शुरुआती आकाशगंगाएं और महाविशालकाय ब्लैक होल्स आकार ले रहे थे। सामान्यतः इस काल की आकाशगंगाएं तारों के समूह जैसी दिखाई देती हैं, लेकिन MoM-BH-1* का व्यवहार पूरी तरह अलग और अप्रत्याशित था।
सामान्य आकाशगंगाओं से अलग क्यों है यह खोज?
जब वैज्ञानिकों ने जेम्स वेब टेलीस्कोप के नियर-इंफ्रारेड स्पेक्ट्रोग्राफ (NIRSpec) से MoM-BH-1* का सघन स्पेक्ट्रोस्कोपिक विश्लेषण किया, तो वे हैरान रह गए। इस ऑब्जेक्ट की विशेषताएं किसी साधारण स्टार-फॉर्मिंग गैलेक्सी से बिल्कुल मेल नहीं खाती थीं:
- विशाल बाल्मर ब्रेक (Enormous Balmer Break): इसके स्पेक्ट्रम में असामान्य रूप से गहरा बाल्मर ब्रेक और विचित्र हाइड्रोजन स्पेक्ट्रल रेखाएं पाई गईं।
- वेवलेंथ विसंगति: यह स्रोत 3 माइक्रोमीटर से अधिक वेवलेंथ पर स्पष्ट और बेहद चमकीला नजर आता है, जबकि छोटी वेवलेंथ (Short Wavelengths) पर लगभग पूरी तरह अदृश्य हो जाता है।
- मल्टी-पीक्ड Hβ उत्सर्जन: इसमें ब्रॉड मल्टी-पीक्ड हाइड्रोजन-बीटा उत्सर्जन और अवशोषण रेखाएं दिखाई दीं, जिन्हें केवल सामान्य तारों की मौजूदगी से नहीं समझाया जा सकता।
‘ब्लैक होल स्टार’ मॉडल: धूल नहीं, घनी अशांत गैस का रहस्य
इस पहेली को सुलझाने के लिए डॉ. रोहन नायडू और उनकी टीम ने एक अनूठा खगोलीय मॉडल विकसित किया। उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि MoM-BH-1* कोई सामान्य आकाशगंगा नहीं है, बल्कि एक ऐसा सुपरमैसिव ब्लैक होल है जो चारों ओर से अत्यधिक घने, प्रचंड अशांत (Turbulent) और पूरी तरह धूल-रहित (Dust-free) हाइड्रोजन गैस के विशाल आवरण से घिरा हुआ है।
खगोलविदों ने इसे प्रतीकात्मक रूप से 'ब्लैक होल स्टार' या 'गैस-एनश्राउडेड ब्लैक होल' का नाम दिया है। इस स्थिति में निकलने वाला कुल विकिरण (Radiation) तारों से नहीं, बल्कि ब्लैक होल के चारों ओर घूमती गैस और उसके अत्यधिक गुरुत्वाकर्षण खिंचाव से उत्पन्न हो रहा है।
रोहन नायडू के अध्ययन ने एक और बड़ा मिथक तोड़ा है। अब तक वैज्ञानिक मानते थे कि शुरुआती ब्रह्मांड के ऐसे ऑब्जेक्ट्स का लाल रंग धूल के कणों (Dust Reddening) के कारण होता है। लेकिन इस रिसर्च ने साबित किया कि यह लालिमा धूल से नहीं, बल्कि अत्यधिक घने और गर्म गैस के आवरण से प्रकाश के बिखरने (Gas-reddening & Scattering) के कारण है। इसका सीधा अर्थ यह है कि पूर्व में ऐसे खगोलीय पिंडों के द्रव्यमान (Mass) को लेकर लगाए गए कई वैज्ञानिक अनुमान अत्यधिक बढ़ा-चढ़ाकर आंके गए हो सकते हैं।
जेम्स वेब के ‘लिटिल रेड डॉट्स’ का सुलझ सकता है रहस्य
जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप के ऑपरेशनल होने के बाद से खगोलविदों के सामने सबसे बड़ा अनसुलझा सवाल 'लिटिल रेड डॉट्स' (Little Red Dots) की मौजूदगी रहा है। ये शुरुआती ब्रह्मांड में दिखने वाले बेहद सघन और लाल बिंदु जैसे स्रोत हैं, जिनकी सटीक प्रकृति अब तक रहस्य बनी हुई थी।
नायडू की टीम के शोध के अनुसार, यदि MoM-BH-1* जैसी प्रणाली अपने निकट स्थित किसी चमकदार पड़ोसी आकाशगंगा के साथ विलीन (Merge) होती है, तो वह बिल्कुल इन्हीं 'लिटिल रेड डॉट्स' जैसा स्वरूप धारण कर लेगी। इसके अतिरिक्त, ब्लैक होल के चारों ओर घने गैस आवरण की उपस्थिति यह दर्शाती है कि यह ब्लैक होल 'सुपर-एडिंगटन दर' (Super-Eddington Accretion) पर पदार्थ को निगल रहा था। यानी यह सामान्य भौतिकी सीमाओं से कहीं अधिक तेजी से गैस सोखकर भारी-भरकम आकार ले रहा था।
खगोल भौतिकी की समझ में क्रांतिकारी बदलाव
दशकों से खगोलविदों के सामने यह गंभीर सैद्धांतिक चुनौती रही है कि बिग बैंग के महज 1 अरब साल के भीतर सूर्य से करोड़ों-अरबों गुना बड़े सुपरमैसिव ब्लैक होल्स कैसे अस्तित्व में आ गए। पारंपरिक मॉडल्स के अनुसार किसी ब्लैक होल को इतना विशाल होने में अरबों साल लगने चाहिए।
रोहन नायडू और उनकी टीम द्वारा खोजा गया यह 'गैस-आच्छादित ब्लैक होल' इस गुत्थी की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी साबित हो सकता है। यह प्रत्यक्ष अवलोकन इस बात का प्रमाण है कि शुरुआती ब्रह्मांड में ब्लैक होल्स को तेजी से विशालकाय बनाने वाली विशिष्ट परिस्थितियां मौजूद थीं।
हैदराबाद के एक महत्वाकांक्षी छात्र से लेकर दुनिया की सबसे बड़ी खगोलीय खोजों में से एक का नेतृत्व करने वाले डॉ. रोहन पी. नायडू का यह शोध वैश्विक विज्ञान जगत में भारत का मान बढ़ा रहा है और हमारे ब्रह्मांड की उत्पत्ति को नए सिरे से परिभाषित कर रहा है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
1. डॉ. रोहन पी. नायडू कौन हैं और वे क्यों चर्चा में हैं?
डॉ. रोहन पी. नायडू हैदराबाद में जन्मे भारतीय मूल के खगोलशास्त्री हैं, जो एमआईटी (MIT) में पापलार्डो फेलो हैं। उनके नेतृत्व में JWST द्वारा बिग बैंग के 660 मिलियन साल बाद का 'ब्लैक होल स्टार' (MoM-BH-1*) खोजा गया है, जो नेचर जर्नल में प्रकाशित हुआ है।
2. 'MoM-BH-1*' क्या है और यह क्यों खास है?
MoM-BH-1* शुरुआती ब्रह्मांड (कॉस्मिक डॉन) का एक अत्यंत चमकीला और लाल खगोलीय पिंड है, जो घने और अशांत हाइड्रोजन गैस के आवरण में छिपा एक तेजी से बढ़ता सुपरमैसिव ब्लैक होल है।
3. 'लिटिल रेड डॉट्स' (Little Red Dots) क्या हैं और इस खोज से उन्हें क्या मदद मिलेगी?
लिटिल रेड डॉट्स जेम्स वेब टेलीस्कोप द्वारा खोजे गए शुरुआती ब्रह्मांड के सघन लाल पिंड हैं। MoM-BH-1* की खोज से यह समझने में मदद मिलेगी कि ये लाल बिंदु वास्तव में गैस से ढके ब्लैक होल्स और आकाशगंगाओं के मिलन से बने हो सकते हैं।
4. क्या ब्लैक होल का लाल रंग अंतरिक्ष की धूल के कारण है?
नहीं, रोहन नायडू के शोध के अनुसार MoM-BH-1* का लाल रंग अंतरिक्षीय धूल से नहीं बल्कि गैस के अत्यधिक घनत्व और प्रकाश के स्कैटरिंग (Scattering) के कारण है।