भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को रखा जाने वाला संतान सप्तमी व्रत इस साल 18 सितंबर 2026, शुक्रवार को रखा जाएगा। सप्तमी तिथि 17 सितंबर को सुबह 10:48 बजे शुरू होगी और 18 सितंबर को दोपहर 1:01 बजे तक रहेगी। चूंकि 18 सितंबर को सूर्योदय के समय सप्तमी तिथि मौजूद रहेगी, इसलिए उदया तिथि के आधार पर इसी दिन व्रत रखना मान्य माना जा रहा है।
संतान सप्तमी को कई जगह मुक्ताभरण सप्तमी और ललिता सप्तमी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा कर संतान के स्वास्थ्य, दीर्घायु, सुख और मंगल की कामना की जाती है। यह धार्मिक मान्यता है; व्रत के फल को लेकर अलग-अलग परंपराओं में अलग मान्यताएं मिलती हैं।
आज 17 सितंबर को है या कल 18 सितंबर को संतान सप्तमी?
संतान सप्तमी की सप्तमी तिथि 17 सितंबर को सुबह 10:48 बजे शुरू हो रही है, लेकिन उस समय सूर्योदय के बाद दिन में षष्ठी तिथि चल रही होगी। सप्तमी 18 सितंबर को दोपहर 1:01 बजे तक रहेगी। इसलिए उदया तिथि के नियम के अनुसार मुख्य व्रत 18 सितंबर को रखना उचित माना जा रहा है।
कुछ पंचांग और परंपराओं में 17 सितंबर की शाम से सप्तमी तिथि के कारण पूजा का उल्लेख मिल सकता है। इसलिए स्थानीय परंपरा का पालन करने वाले अपने क्षेत्र के पंचांग को प्राथमिकता दे सकते हैं।
संतान सप्तमी क्यों मनाई जाती है?
धार्मिक मान्यता के अनुसार संतान सप्तमी का व्रत संतान की सुख-समृद्धि, अच्छे स्वास्थ्य, लंबी आयु और जीवन में मंगल की कामना के लिए रखा जाता है। विशेष रूप से माताएं भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करके अपनी संतान के कल्याण की प्रार्थना करती हैं।
इस दिन शिव-पार्वती की पूजा के साथ व्रत कथा सुनने या पढ़ने की भी परंपरा है। अलग-अलग क्षेत्रों में इस व्रत की कथा और पूजा की सामग्री में कुछ अंतर मिल सकता है।
संतान सप्तमी 2026 का शुभ मुहूर्त
18 सितंबर को पूजा के लिए मध्याह्न समय को विशेष महत्व दिया जाता है। उपलब्ध पंचांग विवरणों में पूजा के मुहूर्त के समय में स्थान के अनुसार अंतर है। इसलिए पूजा का सटीक समय अपने शहर के स्थानीय पंचांग के अनुसार देखना बेहतर रहेगा। सप्तमी तिथि 18 सितंबर को दोपहर 1:01 बजे समाप्त होने के कारण मध्याह्न पूजा तिथि समाप्त होने से पहले पूरी करना महत्वपूर्ण है।
कुछ पंचांगों में 18 सितंबर को सुबह 5:59 से 6:45 बजे तक ब्रह्म मुहूर्त और दोपहर 1:19 से 2:09 बजे तक अभिजीत मुहूर्त बताया गया है, जबकि अन्य गणनाओं में मध्याह्न पूजा का समय अलग है। यह अंतर स्थान आधारित पंचांग गणना के कारण हो सकता है।
संतान सप्तमी पूजा की विधि
- सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें और व्रत का संकल्प लें।
- पूजा स्थान की सफाई करके चौकी पर स्वच्छ वस्त्र बिछाएं।
- भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
- दीपक जलाकर गणेश जी का स्मरण करें और कलश स्थापित करें।
- भगवान शिव को जल, अक्षत, चंदन, पुष्प, बेलपत्र और धूप-दीप अर्पित करें।
- माता पार्वती को रोली, अक्षत, पुष्प और अन्य पूजन सामग्री अर्पित करें।
- पूजा में 7 मीठे पुए या मीठी पूड़ियों का भोग लगाने की परंपरा है।
- संतान सप्तमी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें और संतान के मंगल की प्रार्थना करें।
- अंत में भगवान शिव और माता पार्वती की आरती करें।
7 मीठे पुए का क्यों लगाया जाता है भोग?
संतान सप्तमी की पूजा में 7 मीठे पुए या मीठी पूड़ियां चढ़ाने की परंपरा कई क्षेत्रों में प्रचलित है। इनमें आटा और गुड़ या चीनी का इस्तेमाल किया जाता है। पूजा में संख्या 7 को सप्तमी तिथि से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि अलग-अलग परिवारों और क्षेत्रों में भोग की परंपरा अलग हो सकती है।
संतान सप्तमी का मंत्र
पूजा के दौरान भगवान शिव के पंचाक्षर मंत्र का जाप किया जा सकता है:
ॐ नमः शिवाय।
माता पार्वती के स्मरण के लिए भी श्रद्धा के साथ मंत्र जाप किया जा सकता है:
ॐ पार्वत्यै नमः।
मंत्र जाप के साथ संतान के स्वास्थ्य, दीर्घायु और सुख-समृद्धि की प्रार्थना की जाती है।
संतान सप्तमी पर 7 गांठ वाला डोरा
कुछ परंपराओं में पूजा के दौरान 7 गांठ वाला सूती डोरा या कलावा भगवान शिव के सामने रखकर पूजा करने और बाद में उसे धारण करने की परंपरा है। इसे संतान की रक्षा और मंगलकामना से जोड़ा जाता है। यह क्षेत्रीय परंपरा है और सभी स्थानों पर इसका पालन जरूरी नहीं है।
संतान सप्तमी की आरती
पूजा के अंत में भगवान शिव की आरती की जा सकती है। परिवार की परंपरा के अनुसार शिव-पार्वती की आरती का पाठ करें। प्रचलित शिव आरती की शुरुआत इस प्रकार होती है:
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।
आरती के बाद भगवान शिव और माता पार्वती से संतान के स्वास्थ्य, दीर्घायु और सुख-समृद्धि की प्रार्थना करें।
व्रत में किन बातों का ध्यान रखें?
संतान सप्तमी का व्रत रखने वाले लोग अपनी शारीरिक क्षमता और स्वास्थ्य के अनुसार व्रत की परंपरा अपनाएं। निर्जला व्रत सभी के लिए आवश्यक नहीं माना जाना चाहिए। गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों, बीमार लोगों या नियमित दवा लेने वालों को उपवास से पहले चिकित्सकीय सलाह लेना उचित है।
पूजा के समय स्थानीय पंचांग में दिए गए मुहूर्त को प्राथमिकता दें, क्योंकि सूर्योदय, मध्याह्न और अन्य शुभ समय शहर के अनुसार बदल सकते हैं।