रीवा के संजय गांधी स्मृति चिकित्सालय (SGMH) में स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर एक और गंभीर मामला सामने आया है। यहां इलाज के लिए भर्ती 66 वर्षीय मरीज गिरजा प्रसाद गुप्ता को कथित तौर पर मृत घोषित कर दिया गया। अस्पताल की कागजी प्रक्रिया पूरी होने के बाद परिजन मरीज को घर ले जाने की तैयारी कर रहे थे और शव वाहन भी बुक कर लिया गया था। लेकिन अस्पताल से बाहर ले जाने से पहले मरीज के शरीर में हरकत हुई और सांसें चलती दिखाई दीं। इसके बाद उसे दोबारा अस्पताल में भर्ती कर इलाज शुरू किया गया।
मामले की गंभीरता इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि मरीज को केवल मौखिक रूप से मृत बताने की बात नहीं है, बल्कि रिपोर्टों के अनुसार Death/Discharge से जुड़ी कागजी प्रक्रिया भी पूरी कर दी गई थी। शव सुपुर्दगी की प्रक्रिया के बाद परिजन उसे ले जाने की तैयारी में थे, तभी मरीज के जीवित होने का पता चला।
मरीज को मृत घोषित करने के बाद कैसे सामने आया सच?
जानकारी के अनुसार सीधी निवासी गिरजा प्रसाद गुप्ता को 4 सितंबर की देर रात तबीयत बिगड़ने के बाद रीवा के संजय गांधी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उन्हें मेडिसिन विभाग में उपचार दिया जा रहा था। इलाज के दौरान ड्यूटी पर मौजूद चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।
इसके बाद परिजनों ने शव को घर ले जाने की तैयारी शुरू की। जब उन्हें अस्पताल से बाहर ले जाने की प्रक्रिया चल रही थी, तभी शरीर में हलचल महसूस हुई और सांसें चलती दिखाई दीं। परिजनों ने तत्काल अस्पताल कर्मचारियों और डॉक्टरों को इसकी जानकारी दी। दोबारा जांच के बाद मरीज के जीवित होने की पुष्टि हुई और उसे वापस उपचार के लिए मेडिसिन विभाग में भर्ती किया गया।
मरीज की हालत गंभीर बताई जा रही है और उपचार जारी है।
मेडिसिन विभागाध्यक्ष ने माना- प्रथम दृष्टया चूक हुई
मामले को लेकर मेडिसिन विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. पीके बघेल की ओर से प्रथम दृष्टया चिकित्सकीय चूक स्वीकार किए जाने की बात सामने आई है। उन्होंने पूरे मामले की जांच कराने और लापरवाही सामने आने पर संबंधित चिकित्सक के खिलाफ सख्त कार्रवाई की बात कही है।
अब जांच का अहम सवाल यह है कि मरीज को मृत घोषित करने से पहले किन Medical Protocols का पालन किया गया था। क्या पर्याप्त Clinical Examination हुआ था? क्या आवश्यक Vital Signs, ECG और अन्य जरूरी जांच दोबारा सुनिश्चित की गई थीं? मृत्यु घोषित करने से पहले किस स्तर के डॉक्टर ने अंतिम पुष्टि की? इन सवालों के जवाब जांच में महत्वपूर्ण होंगे।
पोस्टमार्टम से पहले बची जान
इस मामले की सबसे गंभीर बात यह है कि मरीज को मृत मानकर आगे की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी। अलग-अलग रिपोर्टों में शवगृह और Postmortem की तैयारी का उल्लेख है। यदि परिजन समय रहते मरीज में हो रही हरकत को नहीं पहचानते, तो स्थिति और गंभीर हो सकती थी।
यही वजह है कि अब सवाल केवल एक डॉक्टर की गलती तक सीमित नहीं है। मृत्यु घोषित करने की प्रक्रिया, Senior Medical Supervision, Nursing Monitoring और शव सुपुर्दगी से पहले अंतिम Verification जैसे पूरे सिस्टम की समीक्षा जरूरी हो गई है।
और इसी अस्पताल में कुछ दिन पहले कल्पना मिश्रा की मौत
जीवित मरीज को मृत घोषित करने की घटना ऐसे समय सामने आई है, जब श्यामशाह मेडिकल कॉलेज से संबद्ध गांधी मेमोरियल हॉस्पिटल में कुछ दिन पहले 25 वर्षीय कल्पना मिश्रा और उनके नवजात बच्चे की मौत का मामला पहले से विवादों में है। कल्पना को प्रसव के लिए अस्पताल लाया गया था। उनका C-Section हुआ और इसके बाद उनकी तथा नवजात की हालत बिगड़ी। दोनों की मौत हो गई।
मौत से पहले का एक वीडियो भी सामने आया, जिसमें कल्पना अपने परिवार से मदद की गुहार लगाती दिखाई दीं। परिवार ने अस्पताल में इलाज और Monitoring को लेकर गंभीर आरोप लगाए। अस्पताल की ओर से चिकित्सकीय Protocol के अनुसार इलाज किए जाने की बात कही गई थी। मौत की वास्तविक चिकित्सकीय वजह और किसी स्तर पर लापरवाही हुई या नहीं, इसका अंतिम निष्कर्ष जांच से ही निकलना है।
कल्पना मिश्रा मामले में अब तक क्या कार्रवाई हुई?
कल्पना मिश्रा और उनके नवजात की मौत के बाद प्रशासन ने प्रारंभिक स्तर पर कार्रवाई शुरू की। मामले में लापरवाही बरतने वाली प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग की ड्यूटी डॉक्टर डॉ. सोनल अग्रवाल और एनेस्थीसिया विभाग की डॉ. निधि पांडे को निलंबित किया गया। दो Nursing Officers पर भी कार्रवाई हुई। इस तरह प्रारंभिक कार्रवाई का दायरा चार स्वास्थ्यकर्मियों तक पहुंचा।
इन कार्रवाइयों को अभी अंतिम दोषसिद्धि नहीं माना जा सकता। निलंबन एक प्रशासनिक/अनुशासनात्मक कार्रवाई है और अंतिम जिम्मेदारी जांच के निष्कर्षों तथा आगे की कानूनी प्रक्रिया से तय होगी।
अधीक्षक डॉ. राहुल मिश्रा भी पद से हटे
कल्पना मिश्रा की मौत के बाद अस्पताल के तत्कालीन अधीक्षक डॉ. राहुल मिश्रा का परिजनों से बातचीत का एक वीडियो सामने आया था, जिसमें उनकी टिप्पणी को लेकर विवाद हुआ। मामला बढ़ने के बाद शासन ने उन्हें अधीक्षक पद से हटा दिया और डॉ. प्रियंक शर्मा को संजय गांधी अस्पताल की अधीक्षक की जिम्मेदारी दी।
अब Magisterial Inquiry भी होगी
मामले में अब जांच एक और महत्वपूर्ण चरण में पहुंच गई है। 4 सितंबर को उप मुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल के निर्देश पर कल्पना मिश्रा और उनके नवजात की मौत की Magisterial Inquiry के आदेश दिए गए। कलेक्टर ने जांच की जिम्मेदारी सिरमौर SDM दृष्टि जायसवाल को दी है। उन्हें 30 दिन के भीतर स्पष्ट अभिमत के साथ रिपोर्ट देने के निर्देश हैं।
जांचकर्ता अधिकारी को जरूरत के अनुसार Technical Experts की सहायता लेने की अनुमति है। साथ ही राज्य स्तर पर की गई Technical Investigation की रिपोर्ट को भी Magisterial Inquiry में विचार में लिया जाएगा।
सरकार की ओर से क्या-क्या कार्रवाई हुई?
- दो डॉक्टरों को Suspend किया गया।
- दो Nursing Officers पर Suspension की कार्रवाई हुई।
- अस्पताल अधीक्षक डॉ. राहुल मिश्रा को पद से हटाया गया।
- डॉ. प्रियंक शर्मा को नया अधीक्षक बनाया गया।
- मामले की उच्चस्तरीय जांच के लिए समिति गठित की गई।
- कल्पना और नवजात का Postmortem कराया गया।
- अब अलग से Magisterial Inquiry के आदेश दिए गए हैं।
- जांच में दोषी पाए जाने वालों पर कठोर कार्रवाई का आश्वासन दिया गया है।
- सरकार की ओर से पीड़ित परिवार के लिए आर्थिक सहायता की घोषणा भी की गई।
फिर डीन डॉ. सुनील अग्रवाल पर सवाल क्यों?
यहीं से पूरे मामले का सबसे बड़ा प्रशासनिक सवाल सामने आता है। श्याम शाह मेडिकल कॉलेज के डीन डॉ. सुनील अग्रवाल के खिलाफ अभी तक इस मामले में कोई समान स्तर की प्रशासनिक कार्रवाई सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आई है। दूसरी ओर, अस्पताल के अधीक्षक को हटाया जा चुका है और चार स्वास्थ्यकर्मियों को Suspend किया जा चुका है।
इसी अंतर को लेकर परिजनों, सामाजिक संगठनों और प्रदर्शनकारियों की ओर से डीन डॉ. सुनील अग्रवाल की भूमिका पर सवाल उठाए जा रहे हैं। मेडिकल कॉलेज परिसर में प्रदर्शन के दौरान उनके इस्तीफे की मांग भी की गई।
यह सवाल जरूर जांच के दायरे में आ सकता है कि Medical College और उससे जुड़े Teaching Hospital की व्यापक प्रशासनिक व्यवस्था, डॉक्टरों की उपलब्धता, Duty Rosters, Emergency Response, Senior Supervision और Patient Safety Mechanism की निगरानी किस स्तर पर होती है।
सवाल: एक मामले में कार्रवाई, दूसरे में भी व्यवस्था की जवाबदेही?
कल्पना मिश्रा मामले में परिवार और प्रदर्शनकारियों का कहना है कि केवल कुछ डॉक्टरों और Nursing Staff पर कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। उनका सवाल है कि यदि अस्पताल की व्यवस्था में ऐसी गंभीर कमियां थीं तो उनकी निगरानी और सुधार की जिम्मेदारी किस स्तर पर थी?
अब जीवित मरीज को मृत घोषित किए जाने की नई घटना ने इस सवाल को और गंभीर बना दिया है। कुछ ही दिनों के अंतराल में एक ही मेडिकल कॉलेज से सम्बद्ध दो अस्पतालों में पहले जच्चा-बच्चा की मौत और फिर जीवित मरीज को मृत घोषित किए जाने जैसी घटनाएं सामने आने के बाद अस्पताल की पूरी व्यवस्था की स्वतंत्र समीक्षा की मांग मजबूत हुई है।
क्या डीन को हटाना चाहिए?
डीन डॉ. सुनील अग्रवाल के इस्तीफे की मांग अब सार्वजनिक प्रदर्शन का हिस्सा बन चुकी है। मौजूदा घटनाओं को देखते हुए शासन और Medical College प्रशासन के सामने यह स्पष्ट करने का सवाल जरूर है कि SGMH में Institutional Accountability की Chain क्या है और किस स्तर का अधिकारी Hospital Safety, Duty Monitoring और Emergency Preparedness के लिए जिम्मेदार है।
सबसे बड़ा सवाल: क्या सिर्फ डॉक्टर बदलने से व्यवस्था बदलेगी?
कल्पना मिश्रा मामले में दो डॉक्टरों और दो Nursing Officers पर कार्रवाई हुई, अधीक्षक बदले गए और जांच बैठाई गई। अब Magisterial Inquiry भी शुरू हो रही है। लेकिन इसके कुछ ही दिनों बाद एक जीवित मरीज को मृत घोषित किए जाने की घटना सामने आ गई।
इससे संकेत मिलता है कि जांच का दायरा केवल किसी एक घटना के दौरान मौजूद डॉक्टरों तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं होगा। अस्पताल में मृत्यु घोषित करने की प्रक्रिया, Patient Identification, Vital Monitoring, Emergency Response, Senior Medical Supervision, Nursing Protocol, Documentation और शव सुपुर्दगी से पहले Verification की पूरी व्यवस्था की समीक्षा जरूरी है।
अब दो घटनाएं, एक बड़ा सवाल
एक तरफ कल्पना मिश्रा और उनके नवजात की मौत है, जिसकी चिकित्सकीय वजह और जिम्मेदारी अभी जांच के अधीन है। दूसरी तरफ गिरजा प्रसाद गुप्ता का मामला है, जहां एक मरीज को मृत घोषित किए जाने के बाद वह जीवित मिला और उसे दोबारा उपचार देना पड़ा।
इन दोनों घटनाओं को एक-दूसरे का प्रमाण मानना सही नहीं होगा, लेकिन दोनों ने एक ही संस्थान की Patient Care और Administrative Monitoring व्यवस्था पर गंभीर सवाल जरूर खड़े किए हैं। अब जरूरी है कि जांच केवल व्यक्तियों तक सीमित न रहे, बल्कि यह भी तय करे कि ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए अस्पताल की व्यवस्था में कहां और किस स्तर पर कमी रही।
रीवा SGMH में अब आगे क्या?
कल्पना मिश्रा मामले में Magisterial Inquiry की रिपोर्ट का इंतजार है। वहीं नए जीवित मरीज वाले मामले में अस्पताल स्तर पर जांच की बात कही गई है और मेडिसिन विभागाध्यक्ष ने प्रथम दृष्टया चूक स्वीकार की है।
अब सबसे अहम यह होगा कि दोनों मामलों में जांच के निष्कर्ष सार्वजनिक रूप से सामने आएं, जिम्मेदारी व्यक्ति के स्तर पर हो या प्रशासनिक स्तर पर, उसे स्पष्ट किया जाए और ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए ठोस व्यवस्था लागू की जाए।
रीवा के सबसे बड़े सरकारी चिकित्सा संस्थान से जुड़े इन मामलों ने अब केवल दो परिवारों का सवाल नहीं छोड़ा है। यह सवाल पूरे Hospital Administration, Patient Safety और Institutional Accountability का बन चुका है।