नई दिल्ली | साइबर क्राइम और सुप्रीम कोर्टदेश

ट्रेंडिंग Digital Arrest Scam: बैंक देंगे मुआवजा? सुप्रीम कोर्ट की बड़ी पहल; 2026 में 31 अगस्त तक 21,900 से अधिक शिकायतें, ₹647 करोड़ से ज्यादा की डिजिटल ठगी

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डिजिटल अरेस्ट साइबर ठगी मामले में सुप्रीम कोर्ट और बैंक मुआवजे के प्रस्तावित नियम
डिजिटल अरेस्ट साइबर ठगी रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बैंकों की जवाबदेही और मुआवजे के प्रावधान पर जोर दिया।

मुख्य बिंदुQuick Read

  • सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल अरेस्ट ठगी रोकने में बैंकों की जवाबदेही पर जोर दिया।
  • बैंक की जरूरी जांच में लापरवाही से ठगी होने पर पीड़ित को मुआवजा देने का प्रावधान प्रस्तावित नियमों में शामिल करने की बात कही।
  • असामान्य लेन-देन को अस्थायी रूप से रोकने और संदिग्ध गतिविधि की जांच के उपाय सुझाए।
  • RBI से अधिकृत वित्तीय संस्थानों की सूची मांगी गई।

नई दिल्ली। डिजिटल अरेस्ट के नाम पर होने वाली साइबर ठगी को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बैंकों और वित्तीय संस्थानों की जवाबदेही तय करने पर जोर दिया है। गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026 को सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि यदि किसी वित्तीय संस्थान की जरूरी जांच-पड़ताल में लापरवाही के कारण साइबर ठगी होती है, तो पीड़ित को हुए नुकसान की भरपाई के लिए प्रभावी व्यवस्था होनी चाहिए। अदालत ने भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के प्रस्तावित KYC Amendment Directions, 2026 में मुआवजे और रोकथाम से जुड़े स्पष्ट प्रावधान शामिल करने पर जोर दिया।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सवाल उठाया कि जागरूकता अभियान और लगातार खबरें आने के बावजूद पढ़े-लिखे लोग भी डिजिटल अरेस्ट के जाल में कैसे फंस रहे हैं। अदालत ने कहा कि ठगी होने के बाद जांच करना पर्याप्त नहीं है। संदिग्ध लेन-देन को समय रहते पहचानने और रकम ट्रांसफर होने से पहले जरूरी कदम उठाने की व्यवस्था होनी चाहिए।

यह ध्यान रखना जरूरी है कि बैंक से मुआवजे की व्यवस्था को लेकर अदालत की टिप्पणियां और प्रस्तावित नियामकीय बदलाव अभी सभी मामलों में अपने-आप लागू होने वाला सामान्य नियम नहीं हैं। मुआवजे की जिम्मेदारी संबंधित वित्तीय संस्थान की लापरवाही और लागू होने वाले नियमों के आधार पर तय होगी।

सुप्रीम कोर्ट ने बैंकों की जवाबदेही पर क्या कहा?

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया कि यदि किसी ग्राहक के खाते से अचानक ऐसा बड़ा लेन-देन होता है, जो उसके सामान्य बैंकिंग व्यवहार से मेल नहीं खाता, तो बैंक उसे जांच के लिए अस्थायी रूप से रोकने पर विचार क्यों नहीं कर सकते। अदालत ने कहा कि बैंक अपने ग्राहकों के खाते और पुराने लेन-देन का रिकॉर्ड रखते हैं। इस जानकारी का इस्तेमाल संदिग्ध गतिविधियों की पहचान के लिए किया जा सकता है।

अदालत ने प्रस्तावित नियमों में ऐसे सुरक्षा उपाय शामिल करने पर जोर दिया, जिनके तहत असामान्य लेन-देन की पहचान, जरूरत पड़ने पर अस्थायी रोक, स्वचालित अलर्ट और लेन-देन की वास्तविकता की पुष्टि की जा सके। संदिग्ध मामलों में स्थानीय पुलिस को सूचना देने की व्यवस्था पर भी चर्चा हुई।

पीठ ने स्पष्ट किया कि केवल ठगी के बाद रिपोर्ट तैयार कर देना पर्याप्त नहीं है। जरूरत ऐसी व्यवस्था की है, जो संदिग्ध लेन-देन को समय रहते पहचानकर पीड़ित की रकम बचाने में मदद कर सके।

बैंक की लापरवाही साबित हुई तो मुआवजे का प्रावधान

सुप्रीम कोर्ट ने RBI के प्रस्तावित नियमों में ऐसी व्यवस्था शामिल करने पर जोर दिया है, जिसके तहत वित्तीय संस्थान की जरूरी सावधानी बरतने में विफलता के कारण हुई डिजिटल ठगी में पीड़ित को मुआवजा मिल सके। अदालत के आदेश में कहा गया कि ऐसी स्थिति में मुआवजे की रकम ग्राहक के नुकसान से कम नहीं होनी चाहिए।

इसका मतलब यह नहीं है कि हर डिजिटल ठगी के मामले में बैंक को बिना जांच पूरी रकम लौटानी ही होगी। बैंक की भूमिका, जरूरी जांच में हुई चूक और ठगी के बीच संबंध की जांच महत्वपूर्ण होगी। अंतिम जिम्मेदारी लागू नियमों और संबंधित मामले के तथ्यों के आधार पर तय की जाएगी।

अदालत ने RBI से अधिकृत वित्तीय संस्थानों की सूची भी मांगी है, ताकि प्रस्तावित सुरक्षा उपायों के दायरे और उन्हें लागू करने की जिम्मेदारी स्पष्ट हो सके।

डिजिटल अरेस्ट के मामले और ठगी की रकम

डिजिटल अरेस्ट के नाम पर साइबर अपराधी खुद को पुलिस, CBI, ED या किसी अन्य सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताकर लोगों को डराते हैं। कई मामलों में पीड़ित को वीडियो कॉल पर निगरानी में रखने, गिरफ्तारी की धमकी देने या जांच के नाम पर पैसे ट्रांसफर करने के लिए मजबूर किया जाता है।

सुप्रीम कोर्ट के सामने पेश की गई जानकारी के अनुसार, 1 जनवरी से 31 अगस्त 2026 के बीच डिजिटल अरेस्ट से जुड़ी 21,900 से अधिक शिकायतें दर्ज हुई थीं। इन शिकायतों में 647 करोड़ रुपये से अधिक की ठगी की रकम बताई गई। 29 अक्टूबर की सुनवाई के दौरान भी अदालत ने चालू वर्ष में ऐसे अपराधों से करीब 800 करोड़ रुपये के नुकसान को लेकर चिंता जताई।

ये आंकड़े अलग-अलग रिपोर्टिंग अवधियों और प्रस्तुतियों से जुड़े हैं। इसलिए इन्हें एक ही अवधि के अंतिम आंकड़े के रूप में नहीं समझना चाहिए। डिजिटल अरेस्ट के मामले में दर्ज शिकायतों और वास्तविक मामलों की संख्या में भी अंतर हो सकता है।

ढाई करोड़ रुपये की ठगी का मामला भी सामने आया

सुनवाई के दौरान एमिकस क्यूरी और वरिष्ठ अधिवक्ता एनएस नप्पिनई ने एक महिला के साथ डिजिटल अरेस्ट के नाम पर करीब 2.5 करोड़ रुपये की ठगी का मामला बताया। उन्होंने अदालत को बताया कि गिरफ्तारी के डर और मानसिक दबाव में लोग ठगों के निर्देश मान लेते हैं और अपनी जमा-पूंजी गंवा बैठते हैं।

ऐसे मामलों में अपराधी अक्सर पीड़ित को किसी मामले में आरोपी होने, बैंक खाते में अवैध रकम आने या तत्काल जांच की जरूरत होने का दावा करते हैं। इसके बाद वे पैसे को कथित रूप से सुरक्षित खाते में भेजने या जांच पूरी होने तक ट्रांसफर करने के निर्देश देते हैं। सरकारी एजेंसियां इस तरह पैसे जमा कराने के नाम पर फोन या वीडियो कॉल पर लोगों को डिजिटल अरेस्ट नहीं करतीं।

28 अक्टूबर को डिजिटल अरेस्ट को बताया गया था डिजिटल डकैती

इससे एक दिन पहले, 28 अक्टूबर को भी सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल अरेस्ट के जरिए होने वाली साइबर ठगी पर चिंता जताई थी। सुनवाई के दौरान इसे 'डिजिटल डकैती' बताते हुए ऐसे अपराधों से सख्ती से निपटने की जरूरत पर जोर दिया गया था। अदालत ने विशेष रूप से बुजुर्गों को वीडियो कॉल के माध्यम से निशाना बनाए जाने पर चिंता जताई।

यह मामला गौरव कुमार साहा और निधि भंडारी की याचिका से जुड़ी कार्यवाही के संदर्भ में भी चर्चा में रहा। याचिकाकर्ताओं ने विभिन्न राज्यों में दर्ज साइबर अपराध मामलों को एक जगह स्थानांतरित करने की मांग की थी। अदालत ने कहा कि अलग-अलग राज्यों में चल रही जांच को प्रभावित नहीं किया जाना चाहिए और पीड़ितों को केवल आरोपियों की सुविधा के लिए दूसरे स्थान पर बुलाने का आधार नहीं बनाया जा सकता।

28 जुलाई को अलग अपराध बनाने पर विचार की बात

28 जुलाई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल अरेस्ट को आपराधिक कानून में अलग अपराध के रूप में शामिल करने और इसके लिए कड़े दंड पर विचार करने की जरूरत बताई थी। अदालत ने यह भी कहा था कि ठोस सबूत मिलने पर अपराध से जुड़ी संपत्ति को फ्रीज करने जैसे कानूनी कदम उठाए जा सकते हैं।

इन सुनवाइयों के दौरान अदालत का जोर डिजिटल अरेस्ट को केवल व्यक्तिगत सतर्कता का मामला मानने के बजाय बैंकिंग व्यवस्था, पुलिस, नियामकों और डिजिटल प्लेटफॉर्म की भूमिका की समीक्षा करने पर रहा है।

त्योहारों में फर्जी लिंक और ऐप से सावधान रहें

त्योहारों के दौरान ऑनलाइन खरीदारी, डिजिटल भुगतान और यात्रा बुकिंग बढ़ने के साथ फर्जी संदेशों और लिंक के जरिए ठगी का जोखिम भी बढ़ सकता है। अपराधी भारी छूट, पार्सल डिलीवरी, बैंक अलर्ट, KYC अपडेट या बिजली बिल के नाम पर संदेश भेज सकते हैं।

  • अनजान नंबर से आए लिंक पर क्लिक न करें और संदिग्ध ऐप इंस्टॉल न करें।
  • फोन या वीडियो कॉल पर खुद को पुलिस या सरकारी अधिकारी बताने वाले व्यक्ति को पैसे न भेजें।
  • OTP, PIN, पासवर्ड और बैंक की गोपनीय जानकारी किसी के साथ साझा न करें।
  • बैंक या KYC संबंधी संदेश की पुष्टि संबंधित बैंक की आधिकारिक वेबसाइट या ऐप से करें।
  • ठगी होने पर तुरंत अपने बैंक को सूचित करें और साइबर क्राइम हेल्पलाइन 1930 पर संपर्क करें।

डिजिटल अरेस्ट कॉल आए तो क्या करें?

यदि कोई व्यक्ति वीडियो कॉल पर गिरफ्तारी, जांच या कानूनी कार्रवाई का डर दिखाकर पैसे मांगता है, तो कॉल समाप्त कर दें। किसी अनजान व्यक्ति के निर्देश पर बैंक खाते से रकम ट्रांसफर न करें। जरूरत पड़ने पर संबंधित सरकारी एजेंसी के आधिकारिक संपर्क माध्यम से जानकारी की पुष्टि करें।

यदि पैसे ट्रांसफर हो चुके हैं, तो जितनी जल्दी हो सके बैंक को सूचना दें, भुगतान का रिकॉर्ड सुरक्षित रखें और साइबर क्राइम हेल्पलाइन 1930 या राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर शिकायत दर्ज करें। तुरंत सूचना देने से रकम को रोकने या ट्रेस करने की संभावना बेहतर हो सकती है, हालांकि पैसे वापस मिलने की गारंटी नहीं होती।

सुप्रीम कोर्ट की मौजूदा पहल का केंद्र यह है कि डिजिटल अरेस्ट की ठगी को केवल घटना के बाद दर्ज करने के बजाय पहले रोकने की व्यवस्था मजबूत की जाए। RBI के प्रस्तावित नियमों, बैंकिंग सुरक्षा उपायों और जांच एजेंसियों की जवाबदेही पर आगे होने वाली कार्रवाई महत्वपूर्ण होगी।

संपादकीय लेखक एवं रिपोर्टर
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द सिटी एक्सप्रेस न्यूज़ डेस्क
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द सिटी एक्सप्रेस (The City Express) का केंद्रीय संपादकीय न्यूज़ डेस्क। मध्य प्रदेश, विंध्य, बुंदेलखंड और देश-दुनिया की ताज़ा, तथ्यपरक और निष्पक्ष ख़बरों का सत्यापित केंद्र।

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