✍️ विशेष संवाददाता•Published On 6th Sept, 2026 @ 12:20 PM
मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार को लेकर सवाल अब केवल किसी एक कर्मचारी या अधिकारी की रिश्वतखोरी तक सीमित नहीं हैं। 2026 में सामने आई कई Lokayukta कार्रवाइयों से लेकर CAG की Audit Reports तक, सरकारी योजनाओं के Implementation, Monitoring, Financial Management और रिकॉर्ड व्यवस्था पर सवाल दर्ज हुए हैं। सवाल यह है कि अगर नीचे से ऊपर तक सिस्टम में गड़बड़ियां हैं, तो राजनीतिक और प्रशासनिक जवाबदेही आखिर तय किसकी होगी?
भोपाल: मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार को लेकर बहस एक बार फिर तेज होने की जरूरत महसूस होती है। वजह सिर्फ इसलिए नहीं कि किसी दफ्तर का कर्मचारी रिश्वत लेते पकड़ा गया या किसी अधिकारी के खिलाफ लोकायुक्त ने कार्रवाई की। असली सवाल इससे बड़ा है—क्या सरकारी सिस्टम में भ्रष्टाचार अब अलग-अलग व्यक्तियों की करतूत नहीं, बल्कि जवाबदेही की पूरी व्यवस्था से जुड़ी समस्या बनता जा रहा है?
विधानसभा चुनाव 2023 के बाद से मध्य प्रदेश की राजनीति में सरकार की कार्यशैली, प्रशासनिक नियंत्रण और भ्रष्टाचार को लेकर विपक्ष लगातार सवाल उठाता रहा है। दूसरी तरफ सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई और सुशासन का दावा करती है। लेकिन जमीन पर सामने आने वाले रिश्वत के मामले और सरकारी योजनाओं पर CAG की टिप्पणियां इस बहस को एक अलग दिशा देती हैं।
चपरासी से अधिकारी तक—रिश्वत के मामले लगातार क्यों सामने आ रहे?
मध्य प्रदेश में रिश्वत के मामलों की तस्वीर किसी एक विभाग तक सीमित नहीं दिखाई देती। अगस्त 2026 में सतना में रीवा लोकायुक्त की टीम ने जिला सहकारी केंद्रीय बैंक के CEO को कथित तौर पर एक लाख रुपये की रिश्वत लेते रंगे हाथ पकड़ा। आरोप था कि धान खरीदी केंद्र में शॉर्टेज से जुड़े मामले के सेटलमेंट के लिए रकम मांगी गई थी।
इसी महीने बिजली कनेक्शन से जुड़े मामले में Assistant Engineer और Lineman को भी लोकायुक्त ने कार्रवाई करते हुए पकड़ा। रिपोर्ट के मुताबिक किसान से 15 हजार रुपये की मांग की गई थी और 12 हजार रुपये लेते समय कार्रवाई हुई।
ऐसे मामलों में एक कर्मचारी या अधिकारी पकड़ा जाता है और कानूनी कार्रवाई शुरू हो जाती है। लेकिन यहीं से बड़ा सवाल उठता है—क्या भ्रष्टाचार की जड़ सिर्फ वह व्यक्ति है जो पैसे लेते हुए पकड़ा गया, या वह व्यवस्था भी जिम्मेदार है जिसने आम नागरिक को काम कराने के लिए रिश्वत देने की स्थिति में पहुंचाया?
‘ऊपर के नाम पर पैसे’ की शिकायतें—लेकिन प्रमाण कहां हैं?
सरकारी दफ्तरों में आम लोगों के बीच एक धारणा लगातार सुनाई देती है कि छोटा काम हो या बड़ा, बिना पैसे दिए फाइल आगे नहीं बढ़ती। कई मामलों में यह भी शिकायत होती है कि रकम किसी कर्मचारी के लिए नहीं बल्कि किसी वरिष्ठ अधिकारी या राजनीतिक व्यक्ति के नाम पर मांगी गई।
CAG Reports ने भी उठाए सिस्टम पर सवाल
मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार और प्रशासनिक जवाबदेही पर चर्चा केवल लोकायुक्त के मामलों के आधार पर नहीं होनी चाहिए। 2026 में CAG ने राज्य में Jal Jeevan Mission के Implementation पर Performance Audit Report जारी की। रिपोर्ट में Planning, Execution, Monitoring और Financial Management से जुड़ी गंभीर कमियों की ओर इशारा किया गया।
CAG के अनुसार कमजोर Planning ने Mission की Decentralised और Demand-Driven Approach को प्रभावित किया। Audit ने Infrastructure Creation, Contract Management, Fund Utilisation और Monitoring में भी Systemic Deficiencies दर्ज कीं।
इसका अर्थ यह नहीं है कि CAG ने इन सभी कमियों को सीधे ‘भ्रष्टाचार’ घोषित किया है। लेकिन जब किसी बड़े सरकारी Mission में Planning, Contract Management, Fund Utilisation और Monitoring जैसे महत्वपूर्ण हिस्सों पर Audit Objections सामने आते हैं, तो सरकार से जवाबदेही मांगना स्वाभाविक है।
मनरेगा में भी रिकॉर्ड और भुगतान पर सवाल
MGNREGA के Implementation पर CAG की 2026 Report ने भी कई कमियां दर्ज की हैं। Audit के मुताबिक Selected Gram Panchayats में Mandatory Registers को बनाए रखने और अपडेट करने में कमियां मिलीं। 8,575 Applications बिना दस्तावेजी कारण के Process नहीं किए गए।
सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्षों में से एक 2019-24 के दौरान Duplicate, Fake या Incorrect Job Cards पर लगभग ₹1.46 करोड़ के अनियमित Wage Payments से जुड़ा है।
यहां भी सवाल केवल रकम का नहीं है। सवाल उस पूरी Chain का है जिसमें Registration से लेकर Work Allocation, Attendance, Payment और Audit तक कई स्तर मौजूद हैं। अगर किसी स्तर पर सिस्टम कमजोर है तो उसकी जिम्मेदारी तय होना जरूरी है।
गौशाला से Tender तक—हर जगह ‘कट’ की धारणा क्यों?
मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्य में सरकारी पैसा हजारों योजनाओं और विभागों के माध्यम से जमीन तक पहुंचता है। गौशालाएं हों, सड़क निर्माण हो, सरकारी Tender हों, पंचायत के काम हों, मुआवजा हो या किसी सामान्य नागरिक की सरकारी सेवा—हर जगह Transparency और Time-Bound Delivery जरूरी है।
जब लोगों को यह महसूस होने लगे कि सरकारी काम कराने के लिए ‘चढ़ावा’ जरूरी है, तो समस्या केवल रिश्वत लेने वाले कर्मचारी की नहीं रह जाती। यह सरकार की Service Delivery और Accountability System पर सवाल बन जाती है।
और अगर कोई व्यक्ति रिश्वत देने के बाद भी अपना काम नहीं करा पाता, तो यह स्थिति और गंभीर है। इसका मतलब है कि नागरिक के लिए भ्रष्टाचार सिर्फ आर्थिक बोझ नहीं, बल्कि प्रशासनिक अनिश्चितता भी बन गया है।
‘कप्तान’ पर सवाल क्यों?
किसी भी राज्य सरकार की राजनीतिक जवाबदेही अंततः उसके शीर्ष नेतृत्व तक जाती है। इसका मतलब यह नहीं कि हर कर्मचारी की रिश्वत के लिए राज्य के कप्तान को जिम्मेदार ठहराया जाए। लेकिन अगर अलग-अलग विभागों में भ्रष्टाचार के मामले लगातार सामने आते हैं, सरकारी योजनाओं के Implementation पर Audit Objections आते हैं और जनता में व्यवस्था को लेकर अविश्वास बढ़ता है, तो राजनीतिक नेतृत्व से जवाब मांगना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है।
इसीलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि ‘रिश्वत किसने ली?’ सवाल यह भी होना चाहिए कि किस सिस्टम ने उसे रिश्वत लेने का अवसर दिया, शिकायत के बाद कार्रवाई कितनी तेज हुई और उस व्यवस्था को ऊपर से नीचे तक सुधारने की जिम्मेदारी किसकी है?
सवाल सरकार से भी, विपक्ष से भी
भ्रष्टाचार के मुद्दे पर केवल सत्ता पक्ष को कठघरे में खड़ा करना पर्याप्त नहीं है। विपक्ष को भी आरोपों के साथ दस्तावेज और ठोस मामलों को सामने रखना होगा। वहीं सरकार को भी केवल छोटे Trap Cases गिनाने के बजाय यह बताना होगा कि Systemic Corruption रोकने के लिए कौन से Structural Reforms किए गए हैं।
जनता को यह जानने का अधिकार है कि शिकायत के बाद कार्रवाई कितने समय में होगी, रिश्वत मांगने वाले अधिकारी की जवाबदेही कैसे तय होगी, सरकारी Tender और भुगतान में Transparency कैसे सुनिश्चित होगी और Audit Reports में सामने आई कमियों पर कितनी कार्रवाई हुई।
क्योंकि लोकतंत्र में असली ‘कप्तान’ वह नहीं जो मैदान में सबसे ज्यादा प्रभावशाली दिखाई दे, बल्कि वह है जिसके कार्यकाल में व्यवस्था सबसे ज्यादा जवाबदेह, पारदर्शी और नागरिक-केंद्रित बने।
सबसे बड़ा सवाल
मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार के छोटे-बड़े मामले सामने आते रहेंगे और Lokayukta कार्रवाई भी होती रहेगी। लेकिन जब तक सरकार यह नहीं बताएगी कि अलग-अलग मामलों के पीछे मौजूद Systemic Weaknesses को कैसे खत्म किया जा रहा है, तब तक जनता का यह सवाल बना रहेगा—क्या भ्रष्टाचार केवल कुछ ‘कर्मचारियों’ की समस्या है या पूरी Governance Chain की?