बेंगलुरु: कर्नाटक की राजनीति में एक बार फिर महार्षि वाल्मीकि अनुसूचित जनजाति विकास निगम (KMVSTDC) का मामला केंद्र में है। इस कथित फंड घोटाले से जुड़े आरोपों के बीच कर्नाटक के योजना एवं सांख्यिकी मंत्री बी. नागेंद्र ने 28 अगस्त 2026 को मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। नागेंद्र ने इस्तीफा देते समय खुद को निर्दोष बताया और कहा कि उनका फैसला पार्टी और मुख्यमंत्री को उनकी वजह से होने वाली राजनीतिक असहजता से बचाने के लिए है।
नागेंद्र का यह इस्तीफा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 2024 में भी इसी मामले के सामने आने के बाद उन्होंने मंत्री पद छोड़ा था। इसके बाद जांच आगे बढ़ी, ED ने उन्हें गिरफ्तार किया, CBI ने जांच की और जून 2026 में नागेंद्र समेत 30 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की। अगस्त 2026 में CBI ने उनके खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी के लिए कर्नाटक के राज्यपाल से संपर्क किया।
सबसे पहले समझिए- क्या है वाल्मीकि निगम मामला?
वाल्मीकि निगम मामला कर्नाटक महार्षि वाल्मीकि अनुसूचित जनजाति विकास निगम लिमिटेड के फंड से कथित तौर पर बड़ी रकम के अनधिकृत ट्रांसफर और उसके बाद अलग-अलग खातों के जरिए रकम को इधर-उधर किए जाने से जुड़ा है। यह निगम अनुसूचित जनजाति समुदाय के आर्थिक विकास और कल्याण से संबंधित योजनाओं को लागू करता है।
मामला मई 2024 में उस समय सामने आया, जब निगम के अकाउंट्स सुपरिंटेंडेंट पी. चंद्रशेखरन ने आत्महत्या कर ली। उनके पास से छह पन्नों का कथित सुसाइड नोट मिला, जिसमें निगम में वित्तीय अनियमितताओं और दबाव का जिक्र था। इसके बाद मामले की पुलिस जांच शुरू हुई और निगम के खातों से बड़ी रकम के ट्रांसफर की जानकारी सामने आई।
कितने रुपये की गड़बड़ी का आरोप है?
जांच एजेंसियों के मुताबिक, निगम से लगभग ₹89.63 करोड़ की रकम कथित तौर पर गलत तरीके से अलग-अलग खातों में ट्रांसफर की गई। ED के 2024 के आधिकारिक रिकॉर्ड के मुताबिक लगभग ₹89.62 करोड़ निगम के खातों से निकालकर आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में बनाए गए फर्जी खातों में भेजे गए और बाद में रकम को कई खातों के जरिए घुमाया गया।
CBI की जांच में भी करीब ₹89.63 करोड़ के कथित डायवर्जन का उल्लेख है। एजेंसी के अनुसार रकम फर्जी चेक और RTGS ट्रांजैक्शन के जरिए ट्रांसफर की गई और बाद में कई बैंक खातों के माध्यम से उसे अलग-अलग जगह भेजा गया।
वाल्मीकि निगम मामले के मुख्य आंकड़े
| बिंदु | जानकारी |
|---|---|
| कथित डायवर्टेड रकम | करीब ₹89.63 करोड़ |
| मामला सामने आया | मई 2024 |
| मुख्य जांच एजेंसियां | कर्नाटक पुलिस/SIT, CBI, ED |
| 2024 में नागेंद्र का इस्तीफा | जनजातीय कल्याण मंत्री पद से |
| 2024 में ED गिरफ्तारी | 12 जुलाई 2024 |
| 2026 CBI चार्जशीट | नागेंद्र समेत 30 आरोपी |
| 2026 में दूसरी बार मंत्री पद से इस्तीफा | 28 अगस्त 2026 |
मामला कैसे सामने आया?
26 मई 2024 को निगम के अकाउंट्स सुपरिंटेंडेंट पी. चंद्रशेखरन ने शिवमोग्गा में आत्महत्या कर ली थी। उनके कथित छह पन्नों के नोट में निगम के भीतर वित्तीय अनियमितताओं का आरोप लगाया गया था। इस नोट के सामने आने के बाद निगम के फंड से संबंधित लेन-देन की जांच तेज हुई।
बाद में निगम के प्रबंध निदेशक ने बैंक खाते से करीब ₹94.73 करोड़ के कथित अनधिकृत ट्रांसफर को लेकर शिकायत दर्ज कराई थी। शुरुआती रिपोर्टिंग में यही आंकड़ा प्रमुखता से सामने आया। जांच आगे बढ़ने पर जांच एजेंसियों ने लगभग ₹89.63 करोड़ की रकम के कथित डायवर्जन को मामले का प्रमुख हिस्सा बताया।
नागेंद्र का नाम मामले में क्यों आया?
जिस समय कथित वित्तीय अनियमितताएं सामने आईं, उस समय बी. नागेंद्र कर्नाटक सरकार में जनजातीय कल्याण मंत्री थे। विपक्ष ने उनकी राजनीतिक जिम्मेदारी पर सवाल उठाए और उनके इस्तीफे की मांग शुरू कर दी।
नागेंद्र ने शुरुआत से ही अपने ऊपर लगे आरोपों से इनकार किया। उन्होंने कहा कि उन्हें कथित अनियमितताओं की जानकारी नहीं थी और मामला सामने आने के बाद उनके कार्यालय से निगम के प्रबंध निदेशक को निलंबित किया गया था। उन्होंने जांच में सहयोग की बात भी कही।
2024 में नागेंद्र ने इस्तीफा क्यों दिया था?
मई 2024 में मामला सामने आने और विपक्ष के लगातार दबाव के बाद नागेंद्र ने 6 जून 2024 को तत्कालीन सिद्धारमैया सरकार में जनजातीय कल्याण मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। उस समय उन्होंने कहा था कि अगर वह मंत्री पद पर बने रहते हैं तो जांच प्रभावित होने की आशंका पैदा हो सकती है।
नागेंद्र ने तब भी आरोपों को बेबुनियाद बताया था। उन्होंने कहा था कि उन्हें कथित लेन-देन की जानकारी नहीं थी और जांच के दौरान उनका मंत्री पद पर बने रहना उचित नहीं होगा।
2024 में ED ने नागेंद्र को गिरफ्तार भी किया
मामले की जांच आगे बढ़ने के बाद प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने 12 जुलाई 2024 को बी. नागेंद्र को Prevention of Money Laundering Act (PMLA) के तहत गिरफ्तार किया था। ED के अनुसार जांच लगभग ₹89.62 करोड़ के कथित फंड डायवर्जन से संबंधित थी।
ED ने 2024 में कई जगहों पर तलाशी अभियान भी चलाया था। एजेंसी ने बाद में अपनी अभियोजन शिकायत में नागेंद्र को मामले का प्रमुख आरोपी बताते हुए गंभीर आरोप लगाए। हालांकि, ये जांच एजेंसी के आरोप हैं और अंतिम आपराधिक दोषसिद्धि अदालत की प्रक्रिया पर निर्भर करेगी।
ED ने क्या आरोप लगाए?
ED की 9 अक्टूबर 2024 की आधिकारिक अभियोजन शिकायत के अनुसार, करीब ₹89.62 करोड़ निगम के खातों से फर्जी खातों में भेजे गए। एजेंसी ने आरोप लगाया कि रकम को कई शेल संस्थाओं और बैंक खातों के जरिए घुमाया गया तथा उसके एक हिस्से को नकदी और सोने जैसी परिसंपत्तियों में बदला गया।
ED ने यह भी आरोप लगाया कि कथित डायवर्टेड रकम का एक हिस्सा 2024 के लोकसभा चुनाव से संबंधित खर्च और नागेंद्र से जुड़े निजी खर्चों में इस्तेमाल हुआ। ये ED के जांच में लगाए गए आरोप हैं; नागेंद्र ने इन आरोपों को स्वीकार नहीं किया है।
2026 में मामला फिर क्यों गरमाया?
2026 में मामले ने नया राजनीतिक मोड़ तब लिया जब बी. नागेंद्र को फिर से कर्नाटक कैबिनेट में शामिल किया गया। 3 अगस्त 2026 को उन्होंने डीके शिवकुमार सरकार में मंत्री पद की शपथ ली और उन्हें योजना एवं सांख्यिकी विभाग दिया गया।
उनकी दोबारा कैबिनेट में वापसी के बाद BJP और JD(S) ने सरकार पर हमला तेज कर दिया। विपक्ष ने मांग की कि मामले में आरोपी बनाए गए व्यक्ति को मंत्री पद पर नहीं रखा जाना चाहिए। विधानसभा के मानसून सत्र के दौरान भी यह मुद्दा लगातार उठाया गया और सदन की कार्यवाही बाधित हुई।
CBI ने 2026 में क्या किया?
जून 2026 में CBI ने वाल्मीकि निगम मामले और उससे जुड़े दो अन्य सरकारी संस्थानों की कथित वित्तीय अनियमितताओं को लेकर तीन अलग-अलग चार्जशीट दाखिल कीं। इन मामलों में बी. नागेंद्र समेत कुल 30 लोगों को आरोपी बनाया गया।
CBI के अनुसार जांच में नागेंद्र, उनके करीबी सहयोगी नेक्कांति नागराज और तत्कालीन निगम प्रबंध निदेशक जे.जी. पद्मनाभ समेत कई लोगों की कथित भूमिका सामने आई। एजेंसी ने नागेंद्र पर कथित रूप से ₹1.20 करोड़ की अवैध gratification मिलने का आरोप लगाया, जो उनके परिवार से जुड़े बैंक खातों के जरिए पहुंचाई गई बताई गई। CBI ने कथित बेनामी वाहन से जुड़े आरोप भी लगाए हैं।
महत्वपूर्ण: CBI के ये जांच और चार्जशीट में लगाए गए आरोप हैं। नागेंद्र ने इन आरोपों से इनकार किया है और मामले को राजनीतिक साजिश बताया है।
राज्यपाल से अभियोजन की मंजूरी क्यों मांगी गई?
अगस्त 2026 में CBI ने कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोत से बी. नागेंद्र के खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी मांगी। यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों में किसी सार्वजनिक पदाधिकारी के खिलाफ अदालत में अभियोजन आगे बढ़ाने के लिए संबंधित कानूनी प्रावधानों के तहत sanction की जरूरत पड़ सकती है।
CBI की इस कार्रवाई के बाद विपक्ष ने नागेंद्र के तत्काल इस्तीफे की मांग और तेज कर दी। इसी दौरान कर्नाटक विधानसभा का मानसून सत्र भी वाल्मीकि निगम मामले पर लगातार हंगामे के बीच तय समय से तीन दिन पहले समाप्त हुआ।
फिर 28 अगस्त 2026 को नागेंद्र ने इस्तीफा क्यों दिया?
लगातार राजनीतिक दबाव, CBI चार्जशीट और अभियोजन की मंजूरी की मांग के बीच नागेंद्र ने 28 अगस्त को मंत्री पद छोड़ दिया। वह 3 अगस्त को मंत्री बने थे, यानी दूसरी बार मंत्री पद पर उनका कार्यकाल करीब 25 दिन ही रहा।
इस्तीफा देते समय नागेंद्र भावुक हो गए। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने उन्हें हर स्तर पर निर्दोष बताया है और इस्तीफा देने की जरूरत नहीं होने की बात कही थी। लेकिन नागेंद्र के अनुसार वह नहीं चाहते कि उनकी वजह से कांग्रेस पार्टी, उसके नेतृत्व या मुख्यमंत्री की सरकार को असहज स्थिति का सामना करना पड़े।
“मैं अपनी पार्टी को अपनी वजह से असहज स्थिति में नहीं डालना चाहता, इसलिए आज अपनी इच्छा से मुख्यमंत्री को इस्तीफा दे रहा हूं।”
नागेंद्र ने इसे अपराध स्वीकार करने के रूप में पेश नहीं किया। उन्होंने कहा कि वह अपने ऊपर लगे आरोपों के खिलाफ लड़ाई जारी रखेंगे और जनता के बीच जाकर अपनी स्थिति स्पष्ट करेंगे।
इस्तीफे के बाद नागेंद्र ने BJP पर क्या आरोप लगाए?
नागेंद्र ने अपने इस्तीफे के बाद BJP पर राजनीतिक साजिश का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि केंद्रीय एजेंसियों के जरिए उन्हें डराया नहीं जा सकता। उन्होंने खुद को दलित और ST नेता बताते हुए कहा कि उनके राजनीतिक उभार को रोकने की कोशिश की जा रही है।
उन्होंने “मनुवादी” शब्द का इस्तेमाल करते हुए विपक्ष पर हमला किया और संविधान तथा डॉ. बीआर आंबेडकर के सिद्धांतों का हवाला दिया। उन्होंने BJP नेताओं को चुनौती देते हुए जनता की अदालत में अपने खिलाफ आरोप साबित करने की बात कही।}
नागेंद्र ने यह भी कहा कि वह मंत्री पद से इस्तीफा दे रहे हैं, राजनीति से नहीं। उन्होंने संकेत दिया कि वह आगे भी राजनीतिक रूप से सक्रिय रहेंगे और जनता के बीच जाकर अपना पक्ष रखेंगे।
क्या नागेंद्र ने घोटाला स्वीकार किया है?
नहीं। यह तथ्य खबर में स्पष्ट रखना जरूरी है। नागेंद्र ने अपने ऊपर लगे आरोपों से लगातार इनकार किया है। उन्होंने कहा है कि उन्हें फंड के कथित डायवर्जन की जानकारी नहीं थी और उन्हें राजनीतिक कारणों से मामले में निशाना बनाया जा रहा है।
दूसरी तरफ CBI और ED की जांच में उनके खिलाफ गंभीर आरोप लगाए गए हैं और CBI ने उन्हें आरोपी बनाकर चार्जशीट दाखिल की है। इसलिए वर्तमान स्थिति को “जांच एजेंसियों के आरोप और चार्जशीट” के रूप में लिखना तथ्यात्मक रूप से सही है; इसे अंतिम रूप से सिद्ध अपराध कहना उचित नहीं होगा।
2024 और 2026 के इस्तीफे में क्या अंतर है?
| बिंदु | 2024 | 2026 |
|---|---|---|
| पद | जनजातीय कल्याण मंत्री | योजना एवं सांख्यिकी मंत्री |
| सरकार | सिद्धारमैया सरकार | डीके शिवकुमार सरकार |
| मामला | वाल्मीकि निगम फंड मामला | उसी मामले में आगे की जांच/चार्जशीट |
| इस्तीफा | 6 जून 2024 | 28 अगस्त 2026 |
| मुख्य पृष्ठभूमि | मामला सामने आने और विपक्ष के दबाव के बाद | CBI चार्जशीट, अभियोजन मंजूरी की मांग और विपक्षी दबाव के बाद |
| बाद की कार्रवाई | ED ने जुलाई 2024 में गिरफ्तार किया | CBI ने 2026 में चार्जशीट दाखिल की |
इस मामले में अब तक कौन-कौन सी एजेंसियां जांच कर चुकी हैं?
मामले की जांच अलग-अलग चरणों में कर्नाटक पुलिस, SIT/CID, CBI और Enforcement Directorate ने की है। CBI ने मूल वाल्मीकि निगम मामले के अलावा दो अन्य सरकारी संस्थानों से संबंधित कथित वित्तीय अनियमितताओं को भी जांच में शामिल किया।
ED ने इसे मनी लॉन्ड्रिंग के पहलू से जांचा, जबकि CBI ने फंड डायवर्जन और उससे जुड़े कथित आपराधिक षड्यंत्र की जांच की। CBI ने 2026 में तीन अलग-अलग चार्जशीट दाखिल कीं।
क्या पैसा वापस आया?
सरकारी स्तर पर बड़ी रकम की रिकवरी की जानकारी सामने आई है। अगस्त 2026 में प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार कथित रूप से डायवर्ट की गई रकम में से लगभग ₹84 करोड़ राज्य सरकार द्वारा रिकवर किए जाने की बात कही गई। हालांकि, रकम की रिकवरी से आपराधिक मामले की जांच या अदालत में आरोपों का अंतिम निर्धारण अपने आप समाप्त नहीं होता।
विपक्ष क्या कह रहा है?
BJP और JD(S) ने नागेंद्र के दोबारा मंत्री बनने के बाद लगातार उनके इस्तीफे की मांग की। विपक्ष ने आरोप लगाया कि इतने गंभीर मामले में चार्जशीटेड व्यक्ति को कैबिनेट में रखना सरकार की जवाबदेही पर सवाल खड़ा करता है।
विपक्ष ने विधानसभा में विरोध प्रदर्शन किया और बाद में नागेंद्र के इस्तीफे को अपनी राजनीतिक मुहिम की सफलता बताया। BJP ने यह भी कहा कि केवल नागेंद्र के इस्तीफे से मामला खत्म नहीं होगा और कथित तौर पर जिम्मेदार सभी लोगों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।
कांग्रेस और नागेंद्र का पक्ष क्या है?
मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने नागेंद्र के इस्तीफे से पहले उनके बचाव में कहा था कि जांच एजेंसियों की कार्रवाई के बावजूद सरकार को ऐसे दस्तावेज नहीं मिले हैं जिनसे नागेंद्र की भूमिका सीधे तौर पर साबित होती हो। नागेंद्र ने भी कहा कि वह निर्दोष हैं और जांच का सामना करने के लिए तैयार हैं।
नागेंद्र का कहना है कि विपक्ष ने मामले को राजनीतिक हथियार बनाया है और उनके खिलाफ लगाए गए आरोप बेबुनियाद हैं। इस्तीफा देने के बाद भी उन्होंने स्पष्ट किया कि वह राजनीति में सक्रिय रहेंगे और जनता के सामने अपना पक्ष रखेंगे।
अब आगे क्या होगा?
अब मामले का अगला महत्वपूर्ण चरण कानूनी प्रक्रिया है। CBI की चार्जशीट, राज्यपाल से मांगी गई अभियोजन मंजूरी और अदालत में आगे की कार्यवाही यह तय करेगी कि आरोपों पर कानूनी रूप से क्या निष्कर्ष निकलता है।
नागेंद्र का मंत्री पद खत्म हो गया है, लेकिन उनका विधायक पद और राजनीतिक भूमिका अलग मुद्दे हैं। उन्होंने खुद कहा है कि उन्होंने केवल मंत्री पद से इस्तीफा दिया है और राजनीति नहीं छोड़ी है।
पूरे मामले की टाइमलाइन
- 26 मई 2024: निगम के अकाउंट्स सुपरिंटेंडेंट पी. चंद्रशेखरन की आत्महत्या; कथित सुसाइड नोट से मामला चर्चा में आया।
- मई-जून 2024: निगम के फंड ट्रांसफर की जांच शुरू हुई और करीब ₹89.63 करोड़ के कथित डायवर्जन की बात सामने आई।
- 6 जून 2024: बी. नागेंद्र ने जनजातीय कल्याण मंत्री पद से इस्तीफा दिया।
- 12 जुलाई 2024: ED ने नागेंद्र को PMLA के तहत गिरफ्तार किया।
- अक्टूबर 2024: ED ने अभियोजन शिकायत दाखिल कर कई गंभीर आरोप लगाए।
- जून 2026: CBI ने तीन चार्जशीट दाखिल कीं और नागेंद्र समेत 30 लोगों को आरोपी बनाया।
- 3 अगस्त 2026: नागेंद्र दोबारा कर्नाटक कैबिनेट में शामिल हुए।
- अगस्त 2026: CBI ने राज्यपाल से नागेंद्र के खिलाफ अभियोजन की मंजूरी मांगी।
- 28 अगस्त 2026: नागेंद्र ने दूसरी बार मंत्री पद से इस्तीफा दिया।
वाल्मीकि निगम मामला सिर्फ एक राजनीतिक विवाद नहीं है, बल्कि अनुसूचित जनजाति कल्याण के लिए रखे गए सरकारी फंड के कथित डायवर्जन से जुड़ा गंभीर कानूनी मामला है। 2024 में मामला सामने आने के बाद बी. नागेंद्र ने मंत्री पद छोड़ा था। इसके बाद ED और CBI की जांच आगे बढ़ी और 2026 में CBI ने उन्हें आरोपी बनाकर चार्जशीट दाखिल की।
अब 28 अगस्त 2026 को नागेंद्र ने दूसरी बार मंत्री पद से इस्तीफा दिया है। हालांकि उन्होंने आरोपों को खारिज किया है और इस्तीफे को पार्टी हित में लिया गया स्वैच्छिक फैसला बताया है। इसलिए फिलहाल इस मामले का अंतिम निष्कर्ष जांच और अदालत की आगे की कार्यवाही पर निर्भर है।
