सुप्रीम कोर्ट ने CJP प्रदर्शन से जुड़ी FIRs रद्द कीं: 2,873 गंभीर आपराधिक रिकॉर्ड वालों पर अलग जांच, 5 सितंबर का दिल्ली मार्च भी वापस
✍️ विशेष संवाददाता•Published On 1st Sept, 2026 @ 4:13 PM
सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप और केंद्र की assurances के बाद CJP ने 5 सितंबर का प्रस्तावित दिल्ली मार्च वापस ले लिया।साभार: The City Express
सुप्रीम कोर्ट ने 20 से 25 जुलाई के दौरान Cockroach Janta Party (CJP) के नेतृत्व में हुए छात्र आंदोलन से जुड़े मामलों में बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज FIRs को खत्म करने का रास्ता साफ किया, जबकि गंभीर आपराधिक antecedents वाले 2,873 लोगों को अलग रखा गया है। केंद्र ने भविष्य में इसी घटना को लेकर नई FIR दर्ज नहीं करने का आश्वासन दिया। इसके बाद CJP ने 5 सितंबर को India Gate से New Delhi Police Headquarters तक प्रस्तावित मार्च वापस लेने की घोषणा की।
📌 इस खबर की बड़ी बातें (Quick Read)
सुप्रीम कोर्ट ने 20 से 25 जुलाई के CJP आंदोलन से जुड़े FIR मामलों में बड़ी राहत दी।
केंद्र और संबंधित राज्यों ने FIRs quash करने के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था।
2,873 लोगों को गंभीर आपराधिक antecedents के आधार पर अलग रखा गया।
इन लोगों के खिलाफ अलग FIR/जांच की अनुमति दी गई है ताकि हिंसा और संपत्ति नुकसान में उनकी व्यक्तिगत भूमिका की जांच हो सके।
CJP ने सरकार की assurances और कोर्ट के आदेश के बाद 5 सितंबर का प्रस्तावित मार्च वापस ले लिया।
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नई दिल्ली: जुलाई में NEET-UG से जुड़े मुद्दों को लेकर हुए Cockroach Janta Party (CJP) के नेतृत्व वाले छात्र आंदोलन के मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने 1 सितंबर 2026 को बड़ा हस्तक्षेप किया। कोर्ट के आदेश के बाद प्रदर्शन में शामिल छात्रों और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मामलों को खत्म करने की प्रक्रिया आगे बढ़ी है। हालांकि, गंभीर आपराधिक antecedents वाले लोगों को इस राहत से अलग रखा गया है।
केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में 20 से 25 जुलाई के दौरान हुए घटनाक्रम से जुड़े 13 FIRs को quash करने की मांग की थी। इसके साथ ही 2,873 ऐसे लोगों की भूमिका की जांच के लिए अलग FIR की अनुमति मांगी गई थी, जिनके बारे में पुलिस ने गंभीर आपराधिक रिकॉर्ड होने का दावा किया था।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या फैसला दिया?
सुप्रीम कोर्ट ने प्रदर्शन से जुड़े मामलों में उन प्रदर्शनकारियों को राहत दी जो गंभीर आपराधिक antecedents की श्रेणी में नहीं आते। कोर्ट के आदेश के बाद जुलाई के protest से संबंधित FIRs को quash करने का रास्ता साफ हुआ।
हालांकि, यह राहत उन लोगों पर लागू नहीं होती जिन्हें गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि के आधार पर अलग किया गया है। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, ऐसे 2,873 लोगों के संबंध में अलग जांच की अनुमति दी गई है।
इसका उद्देश्य यह पता लगाना है कि प्रदर्शन के दौरान हिंसा, लोगों को चोट पहुंचाने या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने जैसी घटनाओं में इन व्यक्तियों की व्यक्तिगत भूमिका क्या थी।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले की 3 बड़ी बातें
20 से 25 जुलाई के protest से जुड़े FIR मामलों में प्रदर्शनकारियों को बड़ी राहत।
गंभीर आपराधिक antecedents वाले 2,873 लोगों को अलग जांच के दायरे में रखा गया।
इसी protest-related घटनाक्रम को लेकर आगे नई FIR दर्ज नहीं करने का केंद्र ने आश्वासन दिया।
Article 142 का इस्तेमाल क्यों हुआ?
केंद्र और दिल्ली पुलिस ने FIRs को समाप्त कराने के लिए संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत सुप्रीम कोर्ट की विशेष शक्ति का सहारा लिया। अनुच्छेद 142 सुप्रीम कोर्ट को किसी मामले में “complete justice” सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक आदेश जारी करने की व्यापक शक्ति देता है।
इस मामले में बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारियों और कई राज्यों में दर्ज मामलों को देखते हुए केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से व्यापक राहत की मांग की थी।
सुप्रीम कोर्ट के सामने मामला केवल FIR वापस लेने का नहीं था। अदालत को यह भी देखना था कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन में शामिल छात्रों और हिंसा या अन्य गंभीर अपराधों में कथित रूप से शामिल व्यक्तियों के साथ एक जैसा व्यवहार न हो।
2,873 लोगों का मामला अलग क्यों?
केंद्र और दिल्ली पुलिस के अनुसार, प्रदर्शन स्थल पर मौजूद 2,873 लोगों की पहचान ऐसे व्यक्तियों के रूप में हुई जिनके गंभीर आपराधिक antecedents होने की जानकारी पुलिस रिकॉर्ड में थी। सरकार का तर्क था कि केवल प्रदर्शन में मौजूद होने के आधार पर उन्हें सामान्य प्रदर्शनकारियों के साथ नहीं रखा जा सकता।
इसी वजह से इन लोगों की भूमिका की अलग से जांच की अनुमति मांगी गई। इसका मतलब यह नहीं है कि सभी 2,873 लोगों को प्रदर्शन के दौरान हिंसा का दोषी घोषित कर दिया गया है। जांच का उद्देश्य उनकी individual role स्थापित करना है।
यानी केवल किसी व्यक्ति का पुराना criminal record होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि उसने 20 जुलाई के protest में कोई अपराध किया था। इसी वजह से उनकी भूमिका की अलग जांच का रास्ता रखा गया है।
13 FIRs में किस तरह के आरोप थे?
दिल्ली पुलिस की ओर से दाखिल आवेदन के अनुसार, जुलाई के प्रदर्शन के दौरान दर्ज 13 FIRs में rioting, attempt to murder, property damage और robbery जैसे गंभीर आरोप शामिल थे। ये मामले दिल्ली के अलग-अलग पुलिस थानों में दर्ज किए गए थे।
पुलिस ने अब इन व्यापक FIRs को आगे नहीं बढ़ाने की इच्छा जताई और इसके स्थान पर गंभीर आपराधिक antecedents वाले लोगों की भूमिका की जांच के लिए focused कार्रवाई का प्रस्ताव रखा।
क्या अब इस protest को लेकर कोई नई FIR दर्ज होगी?
केंद्र ने आश्वासन दिया है कि 20 से 25 जुलाई के इसी protest-related घटनाक्रम को लेकर आगे नई FIR दर्ज नहीं की जाएगी। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के सामने कहा कि वह प्रदर्शनकारियों को भविष्य में target या harass नहीं करेगी।
इसका मतलब यह नहीं है कि किसी अलग और भविष्य की घटना पर कानून लागू नहीं होगा। यह assurance जुलाई के उसी protest और उससे जुड़े घटनाक्रम के संदर्भ में है।
चार राज्यों ने भी सुप्रीम कोर्ट का रुख किया
दिल्ली के मामलों के अलावा महाराष्ट्र, बिहार, पश्चिम बंगाल और असम ने भी जुलाई के CJP आंदोलन से जुड़े मामलों को quash करने के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। केंद्र की ओर से यह भी बताया गया कि इन राज्यों ने अलग-अलग applications दाखिल की हैं।
इससे मामले का दायरा केवल दिल्ली तक सीमित नहीं रहा। आंदोलन के दौरान कई राज्यों में प्रदर्शन और उससे जुड़े पुलिस मामले दर्ज हुए थे। संबंधित राज्यों की applications भी सुप्रीम कोर्ट के सामने रखी गईं।
5 सितंबर को होने वाला CJP मार्च क्यों रद्द हुआ?
FIRs को लेकर सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में कार्रवाई के बाद CJP ने 5 सितंबर को प्रस्तावित दिल्ली मार्च वापस लेने का फैसला किया। संगठन ने India Gate से New Delhi Police Headquarters तक मार्च निकालने की घोषणा की थी।
CJP का कहना था कि सरकार ने 25 जुलाई को आंदोलन समाप्त कराने के दौरान प्रदर्शनकारियों से कई assurances दिए थे, जिनमें FIRs से राहत और NEET विवाद से जुड़े मृत छात्रों के परिवारों के लिए compensation का मुद्दा भी शामिल था।
1 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में केंद्र की assurances और कोर्ट के आदेश के बाद CJP spokesperson Saurav Das ने संगठन की ओर से 5 सितंबर का मार्च वापस लेने की घोषणा की।
सुप्रीम कोर्ट ने एक दिन पहले मार्च पर रोक क्यों नहीं लगाई थी?
दिल्ली में 5 सितंबर के प्रस्तावित मार्च को लेकर एक अलग याचिका सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी। 31 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया था। कोर्ट ने कहा था कि फिलहाल ऐसा मानने का कोई compelling reason नहीं है कि प्रस्तावित मार्च से कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ेगी।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने प्रदर्शनकारियों और प्रशासन से शांतिपूर्ण तथा कानूनी तरीके से काम करने की अपेक्षा जताई थी। कोर्ट ने कानून-व्यवस्था और आवश्यक अनुमति से जुड़े मुद्दों को प्रशासन के स्तर पर देखने की बात कही थी।
लेकिन इसके अगले ही दिन, यानी 1 सितंबर को, FIRs और सरकार की assurances पर हुए घटनाक्रम के बाद CJP ने खुद मार्च वापस लेने का निर्णय लिया।
पूरा आंदोलन कैसे शुरू हुआ था?
CJP के नेतृत्व में NEET-UG से जुड़े कथित परीक्षा अनियमितताओं और छात्रों की मांगों को लेकर आंदोलन 20 जून 2026 को दिल्ली के जंतर-मंतर से शुरू हुआ था। धीरे-धीरे आंदोलन का विस्तार हुआ और यह कई शहरों तक पहुंचा।
20 जुलाई को प्रदर्शनकारियों ने संसद की ओर मार्च करने की कोशिश की। इस दौरान प्रदर्शनकारियों और सुरक्षाकर्मियों के बीच टकराव हुआ। पुलिस ने भीड़ को रोकने के लिए बल प्रयोग और आंसू गैस का इस्तेमाल किया। इसके बाद कई FIRs दर्ज की गईं।
25 जुलाई को आंदोलन क्यों खत्म हुआ?
लगभग 36 दिनों तक चले आंदोलन के बाद 25 जुलाई को CJP ने सरकार के साथ बातचीत के बाद आंदोलन वापस लेने की घोषणा की। उस समय सरकार की ओर से प्रदर्शनकारियों की कई मांगों पर assurances दिए गए थे।
बाद में FIRs को लेकर विवाद फिर सामने आया। CJP का आरोप था कि सरकार ने जिन assurances के आधार पर आंदोलन समाप्त कराया था, उन्हें लागू करने में देरी की जा रही है। इसी के बाद संगठन ने 5 सितंबर को दोबारा मार्च की घोषणा की थी।
NEET विवाद और छात्रों की मांगें क्या थीं?
आंदोलन का मुख्य मुद्दा NEET-UG से जुड़े परीक्षा विवाद और छात्रों की शिकायतें थीं। आंदोलनकारियों ने परीक्षा व्यवस्था, कथित अनियमितताओं और छात्रों के हितों को लेकर सरकार पर दबाव बनाया था। आंदोलन के दौरान केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग भी प्रमुख मुद्दा बनी।
आंदोलन के अंतिम चरण में सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच बातचीत हुई और इसके बाद आंदोलन समाप्त करने का निर्णय लिया गया।
क्या सभी प्रदर्शनकारियों के खिलाफ मामले पूरी तरह खत्म हो गए?
इस सवाल का जवाब सीधा “सभी” कहना सही नहीं होगा। सामान्य प्रदर्शनकारियों को FIR-related राहत दी गई है, लेकिन गंभीर आपराधिक antecedents वाले 2,873 लोगों को अलग रखा गया है।
इन लोगों के खिलाफ proposed focused investigation का उद्देश्य यह पता लगाना है कि क्या वे जुलाई के protest में हिंसा, चोट या संपत्ति को नुकसान पहुंचाने जैसी घटनाओं में व्यक्तिगत रूप से शामिल थे।
किसे राहत और किसकी जांच?
श्रेणी
स्थिति
सामान्य छात्र/प्रदर्शनकारी
FIR-related राहत
20–25 जुलाई के protest से जुड़े व्यापक FIRs
Quashing की कार्रवाई
गंभीर criminal antecedents वाले 2,873 व्यक्ति
अलग focused investigation
उसी protest से जुड़ी नई FIR
केंद्र ने आगे नई FIR नहीं करने का आश्वासन दिया
5 सितंबर CJP मार्च
वापस लिया गया
NEET पीड़ित परिवारों के compensation पर भी बात
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान केंद्र ने आंदोलन से जुड़ी दूसरी प्रमुख मांग पर भी अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। सरकार ने NEET विवाद के बाद आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों के compensation से संबंधित प्रक्रिया पूरी करने की बात कही है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, इसके लिए सरकार ने लगभग तीन महीने का समय मांगा है।
इस मुद्दे पर आगे की प्रक्रिया और compensation की शर्तें सरकार की ओर से तय की जानी हैं। इसलिए फिलहाल इसे भुगतान पूरा हो जाने के रूप में नहीं लिखा जाना चाहिए।
क्यों महत्वपूर्ण है सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला?
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने एक तरफ शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार और दूसरी तरफ प्रदर्शन के दौरान हुई कथित हिंसा तथा सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान जैसे आरोपों के बीच संतुलन का सवाल था।
कोर्ट के हस्तक्षेप से सामान्य प्रदर्शनकारियों को व्यापक कानूनी राहत मिली, जबकि गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों की व्यक्तिगत भूमिका की जांच का रास्ता खुला रखा गया। इससे blanket criminal proceedings और individual accountability के बीच अंतर स्पष्ट होता है।
अब आगे क्या होगा?
अब 5 सितंबर का CJP मार्च नहीं होगा। संबंधित FIRs को quash करने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार आगे बढ़ेगी। गंभीर आपराधिक antecedents वाले 2,873 लोगों से जुड़े मामले अलग जांच के दायरे में रहेंगे।
इसके अलावा महाराष्ट्र, बिहार, पश्चिम बंगाल और असम की applications पर भी आगे की न्यायिक प्रक्रिया होगी। NEET विवाद से जुड़े मृत छात्रों के परिवारों के compensation को लेकर सरकार द्वारा तय की जाने वाली प्रक्रिया भी महत्वपूर्ण रहेगी।
1 सितंबर 2026 का घटनाक्रम जुलाई के CJP छात्र आंदोलन के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी मोड़ है। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप और केंद्र की assurances के बाद सामान्य प्रदर्शनकारियों के खिलाफ FIR-related कार्रवाई से राहत मिली है। वहीं गंभीर आपराधिक antecedents वाले 2,873 लोगों को अलग रखा गया है ताकि protest के दौरान हुई कथित हिंसा या संपत्ति नुकसान में उनकी व्यक्तिगत भूमिका की जांच की जा सके।
इसी घटनाक्रम के बाद CJP ने 5 सितंबर को India Gate से New Delhi Police Headquarters तक प्रस्तावित मार्च वापस ले लिया है। यानी फिलहाल जुलाई के आंदोलन से जुड़ा तनाव कम होने की दिशा में एक बड़ा कदम सामने आया है, हालांकि अलग-अलग राज्यों के मामलों और compensation से जुड़े मुद्दों पर आगे की प्रक्रिया जारी रहेगी।
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