गणेश उत्सव का छठा दिन 19 सितंबर 2026, शनिवार को मनाया जाएगा। 14 सितंबर को गणेश चतुर्थी के साथ शुरू हुआ 10 दिवसीय गणेश उत्सव अब आगे बढ़ चुका है और घरों, पंडालों तथा मंदिरों में भगवान गणेश की नियमित पूजा-अर्चना जारी है। गणेश उत्सव के दौरान हर दिन गणपति की पूजा श्रद्धा के साथ की जाती है, लेकिन कुछ परंपराओं में अलग-अलग दिनों के लिए गणेश जी के अलग-अलग स्वरूपों की उपासना का भी उल्लेख मिलता है।
नौ दिवसीय गणेश उपासना की एक परंपरा के अनुसार छठे दिन लक्ष्मी गणपति की पूजा की जाती है। इस क्रम में पहले दिन बाल गणपति, दूसरे दिन तरुण गणपति, तीसरे दिन शक्ति गणपति, चौथे दिन संतान गणपति, पांचवें दिन उच्छिष्ट गणपति और छठे दिन लक्ष्मी गणपति की पूजा बताई गई है। हालांकि यह दिन-वार स्वरूप सभी क्षेत्रों और सभी गणेश पूजा परंपराओं में अनिवार्य नहीं माना जाता। इसलिए भक्त अपने घर की परंपरा के अनुसार स्थापित गणपति की पूजा भी कर सकते हैं।
गणेश उत्सव का 6वां दिन कब है?
गणेश चतुर्थी 14 सितंबर 2026 को थी। इसके बाद 15 सितंबर को पांचवां दिन पूरा हुआ और 19 सितंबर को गणेश उत्सव का छठा दिन माना जा रहा है। इस दिन शनिवार है। गणेश उत्सव का मुख्य विसर्जन 25 सितंबर 2026 को अनंत चतुर्दशी के अवसर पर होगा, हालांकि अलग-अलग परिवार और मंडल अपनी परंपरा के अनुसार पहले भी विसर्जन कर सकते हैं।
19 सितंबर को कौन सी तिथि रहेगी?
19 सितंबर 2026 को भाद्रपद शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि रहेगी। उपलब्ध पंचांग गणना के अनुसार अष्टमी तिथि दोपहर करीब 3:26 बजे तक रहेगी और इसके बाद नवमी तिथि शुरू होगी। इसी दिन दूर्वा अष्टमी, राधाष्टमी, गौरी विसर्जन और मासिक दुर्गाष्टमी जैसे पर्व भी बताए गए हैं।
यहां एक बात समझना जरूरी है कि गणेश उत्सव का छठा दिन और शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि एक ही बात नहीं है। उत्सव के दिन की गणना स्थापना के दिन से की जा रही है, जबकि पंचांग की तिथि चंद्रमा की स्थिति के आधार पर निर्धारित होती है। इसलिए 19 सितंबर को उत्सव का छठा दिन होने के बावजूद पंचांग में अष्टमी तिथि है।
छठे दिन किस स्वरूप की पूजा करें?
नौ दिवसीय गणेश उपासना के एक प्रचलित क्रम में छठे दिन लक्ष्मी गणपति की पूजा की जाती है। इस स्वरूप को गणेश जी के ऐसे रूप के रूप में पूजा जाता है जिसमें गणपति के साथ समृद्धि और शुभता से जुड़ी देवी लक्ष्मी की उपासना का भाव भी शामिल है।
हालांकि गणेश उत्सव के 10 दिनों में सभी जगह एक ही स्वरूप की दिन-वार पूजा हो, ऐसा कोई एक सार्वभौमिक नियम नहीं है। इसलिए यदि आपके घर में स्थापना के समय किसी विशेष स्वरूप की गणेश प्रतिमा स्थापित की गई है, तो उसी प्रतिमा की नियमित पूजा करना पूरी तरह उचित है।
लक्ष्मी गणपति की पूजा कैसे करें?
छठे दिन सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें और पूजा स्थल की सफाई करें। गणपति के सामने दीपक जलाकर पूजा का संकल्प लें। इसके बाद भगवान गणेश को जल, अक्षत, रोली या सिंदूर, फूल और दूर्वा अर्पित करें। यदि लक्ष्मी गणपति की उपासना कर रहे हैं तो समृद्धि और शुभता की भावना के साथ पूजा करें।
पूजा में दूर्वा का विशेष महत्व माना जाता है। गणपति को दूर्वा अर्पित करने के बाद फल, मोदक, लड्डू या अपनी श्रद्धा के अनुसार सात्विक भोग लगाया जा सकता है। इसके बाद गणेश मंत्र का जाप करें और अंत में आरती करें।
गणेश जी को क्या भोग लगाएं?
भगवान गणेश की पूजा में मोदक को प्रमुख भोग माना जाता है। इसके अलावा बेसन के लड्डू, बूंदी के लड्डू, फल, नारियल और अन्य सात्विक मिठाइयां भी अर्पित की जा सकती हैं। घर की परंपरा के अनुसार भोग में बदलाव किया जा सकता है।
- मोदक
- मोतीचूर या बेसन के लड्डू
- केला और अन्य मौसमी फल
- नारियल
- दूर्वा
- सात्विक मिठाई
भोग लगाते समय भोजन सात्विक और शुद्ध रखने की परंपरा है। पूजा पूरी होने के बाद प्रसाद परिवार के सदस्यों और अन्य भक्तों में बांटा जा सकता है।
गणेश जी का कौन सा मंत्र जाप करें?
गणेश उत्सव के दौरान सामान्य गणेश मंत्र का जाप किया जा सकता है। पूजा के दौरान श्रद्धा के साथ नीचे दिए मंत्र का जाप करें:
ॐ गं गणपतये नमः।
इस मंत्र का 11, 21, 51 या 108 बार जाप अपनी सुविधा और श्रद्धा के अनुसार किया जा सकता है। यदि विशेष रूप से लक्ष्मी गणपति की पूजा की जा रही है तो संबंधित परंपरा में बताए गए मंत्र का जाप भी किया जा सकता है।
पूजा की सरल विधि
- सुबह स्नान करके स्वच्छ कपड़े पहनें।
- पूजा स्थल और गणपति की प्रतिमा को साफ करें।
- दीपक और धूप जलाएं।
- भगवान गणेश को जल और अक्षत अर्पित करें।
- सिंदूर, फूल और दूर्वा चढ़ाएं।
- मोदक, लड्डू या सात्विक भोग अर्पित करें।
- ॐ गं गणपतये नमः मंत्र का जाप करें।
- गणेश जी की आरती करें।
- परिवार के सदस्यों के साथ प्रसाद ग्रहण करें।
19 सितंबर को गणेश पूजा का शुभ मुहूर्त
पंचांग के अनुसार शुभ मुहूर्त स्थान के अनुसार कुछ मिनट आगे-पीछे हो सकते हैं। 19 सितंबर 2026 के लिए उपलब्ध पंचांगों में अभिजित मुहूर्त लगभग दोपहर 12 बजे के आसपास बताया गया है। उदाहरण के लिए एक पंचांग में यह समय 11:50 AM से 12:39 PM तक दिया गया है।
गणेश जी की नियमित पूजा के लिए केवल अभिजित मुहूर्त का इंतजार करना जरूरी नहीं है। सुबह स्नान के बाद पूजा की जा सकती है और शाम को भी दीपक जलाकर गणपति की आरती करने की परंपरा है। यदि कोई विशेष धार्मिक अनुष्ठान या संकल्प किया जाना है, तो अपने शहर के स्थानीय पंचांग के अनुसार समय देखना बेहतर रहेगा।
राहुकाल में पूजा करें या नहीं?
19 सितंबर 2026 को शनिवार है। अलग-अलग स्थानों के अनुसार राहुकाल का समय बदलता है। उपलब्ध पंचांगों में इस दिन राहुकाल लगभग सुबह 9 बजे से 11 बजे के बीच बताया गया है।
राहुकाल को लेकर धार्मिक मान्यताएं मुख्य रूप से नए शुभ कार्य शुरू करने से जुड़ी हैं। रोज की नियमित पूजा, मंत्र जाप और आरती को लेकर अलग-अलग परंपराओं में अलग मत मिलते हैं। इसलिए सामान्य दैनिक गणेश पूजा को केवल राहुकाल की वजह से रोकना आवश्यक नहीं माना जाता; विशेष अनुष्ठान के लिए स्थानीय पंडित या पंचांग की सलाह ली जा सकती है।
गणेश जी की आरती
पूजा और मंत्र जाप के बाद भगवान गणेश की आरती करें। घरों में प्रचलित गणेश आरती की शुरुआत इस प्रकार होती है:
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा।एकदंत दयावंत, चार भुजा धारी।
माथे सिंदूर सोहे, मूसे की सवारी।
आरती के दौरान दीपक दिखाएं और अंत में भगवान गणेश से परिवार की सुख-शांति, सद्बुद्धि और मंगल की प्रार्थना करें।
छठे दिन क्या प्रार्थना करें?
गणेश उत्सव की पूजा में केवल धन और भौतिक समृद्धि की कामना करने के बजाय बुद्धि, विवेक, परिवार की सुख-शांति और सही निर्णय लेने की क्षमता के लिए भी प्रार्थना की जा सकती है। लक्ष्मी गणपति की उपासना में समृद्धि के साथ शुभता और सद्बुद्धि की भावना को महत्व दिया जाता है।
गणेश उत्सव के दौरान पूजा का सबसे महत्वपूर्ण भाव श्रद्धा और नियमितता है। अलग-अलग क्षेत्रों में पूजा की विधि, भोग, मंत्र और दिन-वार स्वरूप की परंपराएं अलग हो सकती हैं। इसलिए अपने परिवार और स्थानीय परंपरा के अनुसार पूजा करना उचित है।
गणेश उत्सव के अगले दिनों में क्या होगा?
गणेश उत्सव 2026 में 14 सितंबर से शुरू हुआ है और अनंत चतुर्दशी 25 सितंबर को पड़ेगी। जिन घरों और गणेश मंडलों में 10 दिनों तक गणपति विराजमान रहते हैं, वहां इन दिनों सुबह-शाम पूजा, भजन, आरती और प्रसाद वितरण जारी रहेगा। अलग-अलग परिवार अपनी परंपरा के अनुसार डेढ़ दिन, 3 दिन, 5 दिन, 7 दिन या अनंत चतुर्दशी पर विसर्जन कर सकते हैं।