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बुजुर्गों को संपत्ति से बच्चों को बेदखल करने का पूरा अधिकार: सुप्रीम कोर्ट ने पलटा हाईकोर्ट का आदेश, कहा- बढ़ती उम्र में अपमान बर्दाश्त नहीं

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नई दिल्ली / सुप्रीम कोर्ट: बुजुर्गों को संपत्ति से बच्चों को बेदखल करने का पूरा अधिकार: सुप्रीम कोर्ट ने पलटा हाईकोर्ट का आदेश, कहा- बढ़ती उम्र में अपमान बर्दाश्त नहीं
बुजुर्गों को संपत्ति से बच्चों को बेदखल करने का पूरा अधिकार: सुप्रीम कोर्ट ने पलटा हाईकोर्ट का आदेश, कहा- बढ़ती उम्र में अपमान बर्दाश्त नहींसाभार: The City Express

मुख्य बिंदुQuick Read

  • सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने कहा कि बढ़ती उम्र का मतलब असुरक्षा या अपमान नहीं हो सकता; बुजुर्गों को जीवनभर गरिमा से जीने का अधिकार है।
  • इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश रद्द: शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के उस फैसले को खारिज कर दिया जिसमें सीनियर सिटीजन्स एक्ट 2007 के तहत बेटे-बहू की बेदखली के आदेश को रद्द किया गया था।

TCE नेशनल डेस्क। देश में वरिष्ठ नागरिकों और बुजुर्ग माता-पिता के मान-सम्मान व संपत्ति के अधिकारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को स्पष्ट किया कि सीनियर सिटीजन्स (वरिष्ठ नागरिक) अपनी गरिमा और सुरक्षा के लिए अपने बच्चों को संपत्ति से बेदखल कर सकते हैं। शीर्ष अदालत ने कहा कि बढ़ती उम्र का मतलब किसी भी सूरत में असुरक्षा, लाचारी या अपमान नहीं होना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को जीवनभर आत्मसम्मान और गरिमा के साथ जीने का मौलिक अधिकार है। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को पूरी तरह पलट दिया, जिसमें बेटे-बहू को मकान से बेदखल करने के ट्रिब्यूनल कोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया गया था।

'सभ्य समाज की पहचान बुजुर्गों के सम्मान से होती है'

जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 (Senior Citizens Act, 2007) का मूल उद्देश्य बुजुर्गों की गरिमा, भरण-पोषण और सुरक्षा को सुनिश्चित करना है।

पीठ ने रेखांकित किया कि किसी भी सभ्य समाज का स्तर अक्सर इस बात से तय होता है कि वह अपने बुजुर्गों को कितनी गरिमा, सम्मान और सुरक्षा प्रदान करता है। अदालत ने माना कि यदि बच्चे अपने माता-पिता के साथ दुर्व्यवहार करते हैं या उन्हें मानसिक व शारीरिक पीड़ा पहुंचाते हैं, तो ट्रिब्यूनल के पास उन्हें घर से बेदखल करने का पूर्ण अधिकार है।

लखनऊ के विकास नगर का मामला: 81 वर्षीय मां को जाना पड़ा था वृद्धाश्रम

यह पूरा मामला उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के विकास नगर निवासी रवि कांत गुप्ता की विशेष अनुमति याचिका (SLP) से जुड़ा हुआ था। गुप्ता ने 5 जून 2022 को अपने बेटे को मकान से बाहर निकालने के लिए जिला मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन प्रस्तुत किया था। यह मकान रवि कांत गुप्ता की अपनी गाढ़ी कमाई से खरीदी गई (स्व-अर्जित) संपत्ति थी।

घरेलू विवाद और उत्पीड़न की स्थिति इस कदर बढ़ गई थी कि रवि कांत गुप्ता की 81 वर्षीय वृद्ध मां को अपना ही घर छोड़कर वृद्धाश्रम में शरण लेने के लिए मजबूर होना पड़ा था। मामले की गंभीरता को देखते हुए एसडीएम (SDM) ने 15 नवंबर 2022 को बेटे की बेदखली का आदेश दिया। इसके बाद जिला मजिस्ट्रेट (DM) ने 9 अगस्त 2023 को इस फैसले को बरकरार रखते हुए बेटे और बहू को मकान तत्काल खाली करने का निर्देश जारी किया था।

हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने बताया त्रुटिपूर्ण

एसडीएम और डीएम के आदेश के खिलाफ बेटे और बहू ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि 2007 का कानून बुजुर्गों को अपनी संपत्ति से बच्चों को बेदखल करने का स्पष्ट अधिकार नहीं देता, और इस आधार पर हाईकोर्ट ने दोनों प्रशासनिक आदेशों को रद्द कर दिया था।

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस निष्कर्ष को खारिज करते हुए कहा कि हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के आदेश में हस्तक्षेप करके भारी भूल की है। शीर्ष अदालत ने कानूनी प्रावधानों की व्याख्या करते हुए कहा:

  • धारा 7 और 8 की शक्तियां: एक्ट की धारा 7 के तहत मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल गठित किए गए हैं और धारा 8 ट्रिब्यूनल को सिविल कोर्ट जैसी सभी आवश्यक न्यायिक शक्तियां प्रदान करती है।
  • सिविल कोर्ट के क्षेत्राधिकार पर रोक: एक्ट की धारा 27 सामान्य सिविल कोर्ट के हस्तक्षेप को रोकती है ताकि बुजुर्गों को त्वरित न्याय मिल सके। अतः कानून के मूल उद्देश्य की पूर्ति के लिए ट्रिब्यूनल को बेदखली का आदेश देने का पूरा अधिकार है।

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला

अदालत ने अपने निर्णय में 'एस. वनिता बनाम डिप्टी कमिश्नर (2021)' के ऐतिहासिक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि माता-पिता या वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण और सुरक्षा के लिए आवश्यकता पड़ने पर बच्चों को संपत्ति से हटाना भी उनके अधिकारों की रक्षा का एक अनिवार्य कानूनी माध्यम है। पीठ ने स्पष्ट किया कि यही विधिक स्थिति बाद में समटोला देवी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार (2025) और कमलकांत मिश्रा बनाम एडिशनल कलेक्टर (2025) के मामलों में भी दोहराई जा चुकी है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

1. सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ नागरिकों की संपत्ति और बेदखली पर क्या फैसला दिया है?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सीनियर सिटीजन्स को अपनी संपत्ति से बच्चों को बेदखल करने का अधिकार है और मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल इसके लिए वैध आदेश जारी कर सकता है।

2. सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को क्यों पलटा?

हाईकोर्ट ने माना था कि सीनियर सिटीजन्स एक्ट में बेदखली का अधिकार नहीं है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने गलत ठहराते हुए कहा कि कानून का उद्देश्य बुजुर्गों को गरिमा और सुरक्षा देना है।

3. सीनियर सिटीजन्स एक्ट की कौन सी धाराएं ट्रिब्यूनल को अधिकार देती हैं?

एक्ट की धारा 7 ट्रिब्यूनल के गठन और धारा 8 उसे सिविल कोर्ट जैसी शक्तियां प्रदान करती है, जिससे वह बेदखली का आदेश दे सकता है।

4. यह विवाद किस शहर और संपत्ति से जुड़ा हुआ था?

यह मामला लखनऊ के विकास नगर का था, जहां एक बुजुर्ग पिता की स्व-अर्जित संपत्ति से बेटे-बहू द्वारा प्रताड़ित किए जाने के बाद बेदखली की मांग की गई थी।

संपादकीय लेखक एवं रिपोर्टर
सत्यापित रिपोर्टर
विशेष संवाददाता

मध्य प्रदेश, विंध्य, बुंदेलखंड और राष्ट्रीय घटनाक्रमों पर द सिटी एक्सप्रेस की विशेष रिपोर्टिंग टीम।

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