त्रिपुरा / नई दिल्लीदेश

पीएम के खिलाफ अभद्र टिप्पणी केस रद्द करने से HC का इनकार: कहा- राजनीतिक आलोचना जायज, लेकिन मानहानि को अभिव्यक्ति की आजादी का कवच नहीं

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त्रिपुरा / नई दिल्ली: पीएम के खिलाफ अभद्र टिप्पणी केस रद्द करने से HC का इनकार: कहा- राजनीतिक आलोचना जायज, लेकिन मानहानि को अभिव्यक्ति की आजादी का कवच नहीं
पीएम के खिलाफ अभद्र टिप्पणी केस रद्द करने से HC का इनकार: कहा- राजनीतिक आलोचना जायज, लेकिन मानहानि को अभिव्यक्ति की आजादी का कवच नहींसाभार: The City Express

मुख्य बिंदुQuick Read

  • आपराधिक मामले रद्द करने से इनकार: त्रिपुरा हाईकोर्ट ने प्रधानमंत्री, अगरतला के मेयर और त्रिपुरेश्वरी माता पर कथित आपत्तिजनक टिप्पणी से जुड़े केस रद्द करने वाली याचिकाएं खारिज कीं।
  • आलोचना और अपमान में फर्क: न्यायमूर्ति टी. अमरनाथ गौड़ और न्यायमूर्ति एस. दत्ता पुरकायस्थ की पीठ ने कहा कि राजनीतिक असहमति लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन दुर्भावनापूर्ण भाषा को फ्रीडम ऑफ स्पीच का संरक्षण नहीं मिल सकता।

TCE नेशनल डेस्क। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर राजनीतिक बहस और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे को लेकर त्रिपुरा हाईकोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण एवं नजीर पेश करने वाला निर्णय सुनाया है। अदालत ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अगरतला के मेयर और त्रिपुरेश्वरी माता के खिलाफ सोशल मीडिया पर कथित आपत्तिजनक एवं अपमानजनक टिप्पणियां करने के मामले में दर्ज एफआईआर और चार्जशीट को रद्द करने से साफ इनकार कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि लोकतंत्र में संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्तियों की नीतियों और फैसलों की आलोचना करना प्रत्येक नागरिक का अधिकार है, लेकिन आलोचना की आड़ में किसी की सामाजिक प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाने वाली अभद्र व मानहानिकारक भाषा को संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की आजादी का संरक्षण प्राप्त नहीं हो सकता।

कंटेंट क्रिएटर माधबी बिस्वास की याचिकाएं खारिज

यह पूरा मामला कंटेंट क्रिएटर माधबी बिस्वास चक्रवर्ती द्वारा दायर दो अलग-अलग याचिकाओं से जुड़ा हुआ था। याचिकाकर्ता के खिलाफ ईस्ट अगरतला और वेस्ट अगरतला थानों में गंभीर धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी। पुलिस द्वारा मामले की जांच पूरी कर अदालत में चार्जशीट दाखिल किए जाने के बाद चक्रवर्ती ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए इन सभी आपराधिक कार्यवाहियों को रद्द करने की मांग की थी।

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई थी कि उनके बयान केवल एक व्यक्तिगत राय और राजनीतिक दृष्टिकोण थे, जो संविधान द्वारा प्रदत्त विचार व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में आते हैं। साथ ही यह दावा भी किया गया था कि उनके खिलाफ दर्ज मामले राजनीति से प्रेरित हैं।

राज्य सरकार की दलील: प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने की मंशा

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने याचिकाओं का कड़ा विरोध किया। अभियोजन पक्ष ने अदालत को बताया कि जांच के दौरान ऐसे पर्याप्त साक्ष्य और सामग्री मिली है, जिससे प्रथम दृष्टया यह साबित होता है कि प्रधानमंत्री और अगरतला के मेयर के खिलाफ इस्तेमाल किए गए शब्द जानबूझकर उनकी सार्वजनिक छवि और प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने के उद्देश्य से बोले गए थे।

इसके अतिरिक्त, राज्य सरकार ने रेखांकित किया कि त्रिपुरेश्वरी माता को लेकर की गई अनुचित टिप्पणियों से जनमानस की धार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं। ऐसे में मामले को प्रारंभिक स्तर पर खारिज करना न्यायोचित नहीं होगा और तथ्यों की विस्तृत पड़ताल ट्रायल कोर्ट में ही होनी चाहिए।

हाईकोर्ट की दो सदस्यीय पीठ की अहम टिप्पणियां

न्यायमूर्ति टी. अमरनाथ गौड़ और न्यायमूर्ति एस. दत्ता पुरकायस्थ की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए सोशल मीडिया के वर्तमान परिदृश्य और कानूनी जवाबदेही पर विस्तृत टिप्पणियां कीं:

  • साइबर मानहानि पर नियंत्रण जरूरी: अदालत ने कहा कि डिजिटल मीडिया के युग में लोग तेजी से अपनी राय साझा करते हैं, लेकिन यही माध्यम कई बार ऑनलाइन बदनामी और साइबर मानहानि का खतरनाक जरिया बन जाता है।
  • अधिकार निरपेक्ष नहीं: संविधान में मिला अभिव्यक्ति का मौलिक अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन यह किसी को भी दूसरे नागरिक की प्रतिष्ठा हनन की असीमित छूट नहीं देता।
  • डिजिटल प्लेटफॉर्म पर तेजी से नुकसान: कोर्ट ने रेखांकित किया कि सोशल मीडिया पर पोस्ट कुछ ही मिनटों में लाखों लोगों तक पहुंच जाती है, जिससे किसी व्यक्ति की छवि को अपूरणीय क्षति पहुंच सकती है।

नीतिगत आलोचना बनाम व्यक्तिगत अपमान

अदालत ने अपने फैसले में यह अत्यंत महत्वपूर्ण भेद स्पष्ट किया कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार, प्रधानमंत्री अथवा किसी अन्य जनसेवक के नीतिगत निर्णयों, योजनाओं और राजनीतिक विचारों की तीखी आलोचना करना पूरी तरह वैध और सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा है।

हालांकि, यदि आलोचना के नाम पर दुर्भावनापूर्ण, असत्यापित या घृणास्पद भाषा का प्रयोग किया जाता है, तो मात्र उसे 'व्यक्तिगत विचार' बताकर आपराधिक मानहानि की जवाबदेही से बचा नहीं जा सकता। पीठ ने दोनों याचिकाओं को खारिज करते हुए निचली अदालत को नियमानुसार ट्रायल आगे बढ़ाने का निर्देश दिया।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

1. त्रिपुरा हाईकोर्ट ने किस मामले में एफआईआर रद्द करने से इनकार किया है?

हाईकोर्ट ने प्रधानमंत्री, अगरतला के मेयर और धार्मिक आस्था पर सोशल मीडिया पर कथित अपमानजनक टिप्पणी करने के मामले में दर्ज चार्जशीट को रद्द करने से इनकार कर दिया।

2. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हाईकोर्ट का क्या मुख्य रुख रहा?

कोर्ट ने कहा कि राजनीतिक असहमति और नीतियों की आलोचना जायज है, लेकिन सोशल मीडिया पर मानहानिकारक व अभद्र भाषा का उपयोग करने पर अभिव्यक्ति की आजादी का संरक्षण नहीं मिलता।

3. याचिकाकर्ता का मुख्य तर्क क्या था?

याचिकाकर्ता माधबी बिस्वास चक्रवर्ती का तर्क था कि उनके बयान केवल राजनीतिक राय थे और उन्हें संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत संरक्षण प्राप्त है।

4. मामले की सुनवाई किन जजों की पीठ ने की?

इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति टी. अमरनाथ गौड़ और न्यायमूर्ति एस. दत्ता पुरकायस्थ की दो सदस्यीय खंडपीठ ने की।

संपादकीय लेखक एवं रिपोर्टर
सत्यापित रिपोर्टर
विशेष संवाददाता

मध्य प्रदेश, विंध्य, बुंदेलखंड और राष्ट्रीय घटनाक्रमों पर द सिटी एक्सप्रेस की विशेष रिपोर्टिंग टीम।

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