सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल में 1 सितंबर को हुआ जटिल ट्रांसप्लांट; डोनर की किडनी की असामान्य रक्तवाहिका संरचना के बावजूद विशेषज्ञ टीम ने सफलतापूर्वक पूरी की प्रक्रिया
रीवा। रीवा के सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल में किडनी प्रत्यारोपण के क्षेत्र में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि सामने आई है। अस्पताल में 1 सितंबर 2026 को एक जटिल किडनी ट्रांसप्लांट सफलतापूर्वक किया गया, जिसमें पति ने अपनी किडनी पत्नी को डोनेट की। प्रत्यारोपण के बाद मरीज की स्थिति संतोषजनक रही और उसे 10 सितंबर 2026 को अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।
इस मामले की खासियत केवल सफल प्रत्यारोपण नहीं, बल्कि इसकी जटिलता भी रही। मरीज का ट्रांसप्लांट डायलिसिस शुरू होने से पहले किया गया। मेडिकल भाषा में इसे प्री-एम्प्टिव किडनी ट्रांसप्लांट कहा जाता है। इसके अलावा डोनर की किडनी की रक्तवाहिका संरचना सामान्य स्थिति से अलग थी, जिसके कारण सर्जरी के दौरान अतिरिक्त तकनीकी चुनौती का सामना करना पड़ा।
डायलिसिस से पहले हुआ किडनी ट्रांसप्लांट
नेफ्रोलॉजिस्ट एवं ट्रांसप्लांट फिजिशियन डॉ. रोहन द्विवेदी के अनुसार, उपयुक्त मरीजों में डायलिसिस शुरू होने से पहले किडनी ट्रांसप्लांट पर विचार किया जा सकता है। इसे प्री-एम्प्टिव ट्रांसप्लांट कहा जाता है।
डॉ. द्विवेदी ने बताया कि डायलिसिस से जुड़ी कुछ जटिलताओं से बचने में इस रणनीति की भूमिका हो सकती है। इनमें हृदय संबंधी समस्याएं, संक्रमण और एनीमिया जैसी स्थितियां शामिल हैं। उनके अनुसार, उपयुक्त मरीजों में किडनी की बीमारी को अंतिम अवस्था तक पहुंचने का इंतजार किए बिना ट्रांसप्लांट के विकल्प पर समय रहते विचार किया जाना चाहिए।
डोनर की रक्तवाहिका संरचना बनी बड़ी चुनौती
प्रमुख ट्रांसप्लांट सर्जन एवं यूरोलॉजिस्ट डॉ. पुष्पेंद्र शुक्ला ने बताया कि इस मामले में डोनर यानी पति की रीनल आर्टरी सामान्य स्थिति की तुलना में काफी पहले दो शाखाओं में विभाजित हो रही थी। इससे प्रत्यारोपण के लिए उपलब्ध रक्तवाहिका की लंबाई अपेक्षाकृत कम हो गई थी।
इस चुनौती के कारण सर्जिकल टीम को एक स्थान के बजाय दो जगह वैस्कुलर जोड़ लगाने पड़े। टीम ने सावधानीपूर्वक सर्जिकल प्लानिंग और विशेषज्ञ तकनीक के माध्यम से इस जटिलता को संभाला और प्रत्यारोपण सफलतापूर्वक पूरा किया।
विशेषज्ञों की संयुक्त टीम ने संभाली जिम्मेदारी
सफल प्रत्यारोपण डॉ. रोहन द्विवेदी और डॉ. पुष्पेंद्र शुक्ला के नेतृत्व में किया गया। यूरोलॉजी विभाग से डॉ. आशीष धनघोरिया, डॉ. उज्ज्वल तिवारी, डॉ. अमित सिंह और डॉ. अविनाश सोनी सहित विशेषज्ञ चिकित्सकों ने प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
एनेस्थीसिया विभाग से डॉ. अम्बरनाथ गौतम, डॉ. आलोक प्रताप सिंह, डॉ. शुभम अग्रवाल, डॉ. राजीव द्विवेदी, डॉ. रवि प्रकाश सिंह और डॉ. एल.पी. सिंह ने अपनी जिम्मेदारी निभाई। ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेटर, पैरामेडिकल स्टाफ, नर्सिंग टीम, टेक्नीशियन, वार्ड बॉय और सफाईकर्मियों के समन्वित प्रयास को भी सफलता में महत्वपूर्ण बताया गया।
प्री-एम्प्टिव ट्रांसप्लांट से क्या फायदा?
प्री-एम्प्टिव किडनी ट्रांसप्लांट में मरीज को लंबे समय तक डायलिसिस पर रहने से पहले ही प्रत्यारोपण किया जाता है। डॉ. रोहन द्विवेदी के अनुसार, उपयुक्त मरीजों में इससे डायलिसिस से जुड़ी कुछ जटिलताओं से बचने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, यह विकल्प प्रत्येक किडनी रोगी के लिए समान रूप से उपयुक्त नहीं होता। ट्रांसप्लांट का निर्णय मरीज की बीमारी की स्थिति, डोनर की उपयुक्तता, चिकित्सकीय जांच और विशेषज्ञों के आकलन के आधार पर किया जाता है।
अंगदान को लेकर जागरूकता जरूरी
चिकित्सकों ने किडनी डोनेशन को लेकर समाज में मौजूद भ्रांतियों को दूर करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उनका कहना है कि निर्धारित चिकित्सकीय जांच और मानकों के अनुरूप योग्य व्यक्ति द्वारा किडनी दान किए जाने के बाद सामान्य जीवन जीना संभव है। हालांकि, किसी भी व्यक्ति के लिए अंगदान की उपयुक्तता का निर्णय विस्तृत चिकित्सकीय जांच और विशेषज्ञों की सलाह के आधार पर ही किया जाता है।
रीवा में इस तरह के जटिल किडनी प्रत्यारोपण की सफलता विंध्य क्षेत्र के मरीजों के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है। स्थानीय स्तर पर ट्रांसप्लांट सेवाओं का विस्तार गंभीर किडनी रोगियों को अपने क्षेत्र में ही विशेषज्ञ उपचार उपलब्ध कराने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।